अनकही १८५७

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

 इतिहास में उदादेवी की कहानी भले दर्ज ना हो। लेकिन उनकी देश भक्ति बेमिसाल थी।लखनौ के नवाब वाजीदअली शाह की बेगम, हजरत महल बेगम की महिला सैन्य में कार्यरत थी,   सेवा और संरक्षण करने का कार्य भी उसीका था,वह दलित  समाज से आती थी। उसके पति  मक्का पासी भी राज्य की सैना में  सैनीक थे। अंग्रेजो के खिलाफ पहला विद्रोह था १८५७ में, जिसका परचम बेगम हजरत महल ने उठाया था।

वाजीदअली शाह को कलकत्ता में निर्वासित कर दिया था। लौखनौ के पास चिनट में नवाब की फौज और अंग्रेजो के बीच  लड़ाई  हुई ,जिसमे नवाब के कई सैनिकों के साथ उदा देवी के पति की भी मृत्यु हो गई।पति की मृत्यु से आहत , उदा देवी ने कुछ करने की ठानी।

    सिकंदर बाग में एक घना  पीपल का पेड़ था जिस के नीचे अंग्रेज सैनिक दुपहर में आराम करते थे।ये उदा देवी जानती थी ।  बदला लेने के लिए १६ नवंबर १८५७ के दिन वे पेड़ पर बंदूक लेके  छुपकर बैठ गई, जहां ३६ अंग्रेज सैनिक आराम कर रहे थे तो  उन्हें गोलियों से भून डाला।जब डावसन अपने सैनिकों के साथ वहां पहुंचा तो इतने सैनिकों को मृत देख ,तफ्तीश करने लगा किंतु गोलियां कहा से आई समझ नहीं पाए।फिर किसी ने पत्तों में छिपकर लाल जैकेट पहने कोई बैठा दिखा तो गोली चलाई,उदा देवी धड़ाम से नीचे गिरी और जब जैकेट हटाई तो पता चला की वो एक औरत थी। मरने से पहले ३६ अंग्रेजो को मार कर वीरांगना शाहिद हुई थी।

      उदा देवी पिछड़े वर्ग और स्त्रियों का स्वराज प्राप्त करने में  योगदान का ज्वलंत उदाहरण है।पता नहीं क्यों इतिहास में उनका नाम धूमिल पड़ गया।उनका नाम ही गायब है। किंतु उत्तर प्रदेश में इनकी लोक कथाओं में और जनश्रुतियों में अभी भी जिंदा हैं।भारत के गणतंत्र में असली गढ़ ऐसी ही कुर्बानियां है जो नीव की ईंटो की तरह है, जो दिखती 

तो नहीं  है लिकिन इमारत उनके बगैर टिक नहीं पाती। पता नहीं ऐसी कई विभूतियां इतिहास में गर्त हो गई होगी।

जयश्री बिर्मी

अहमदाबाद