ऐ वक़्त

तू क्या परखेगा वक़्त हमें,

हम तो हवा बन गुज़र जाएंगे..

और तू गुज़रे वक़्त में निशाँ भर खोजता रह जाएगा।

छोड़ जाएंगे 

अधूरे किस्सों का कारवां

और तू 

टूटी लड़ियाँ भर 

पिरोता रह जाएगा।

शिकायत नहीं 

बस सज़ा देंगे तुझे 

माफी के शक्ल में,

और तू अपने गुनाहों को गिनता रह जाएगा!

तू क्या छोड़ेगा हमें मझधार में,

हम तो लहरों में ही खो जाएंगे

और तू साहिल तकता रह जाएगा।

ऐ वक़्त तू किसका हुआ अब तक...

हमें क्या ठगेगा तू 

हम तुझे पीछे छोड़

दूर-बहुत दूर निकल जाएंगे 

और तू निशान ढूंढ़ता रह जाएगा।

तू क्या परखेगा वक़्त हमें....

 ©डॉ0श्वेता सिंह गौर, हरदोई