विस्तार

अंतर्मन का 

विस्तार तुम में भी है

मुझमें भी है

प्रेम तुम्हें भी प्रखर है 

और मुझे भी है,

इसकी थाह कितनी है?

कुछ पता नहीं है

और जानना भी नहीं है,

डूबने में जो आनंद 

की अनुभूति है

वो थाह लेने से

 कई गुना ज्यादा

रोमांचित करती है,

प्रेम के अनंत सागर में 

गोते लगाते लगाते 

जन्म जन्मांतर से 

निर्वाण प्राप्ति का लक्ष्य साधे

इन सभी सांसारिक 

औपचारिकताओं को

पूर्ण करके और 

आध्यात्मिक शिखर पर 

पहुँच के हम दोनों 

को आखिरकार

एक दिन पंख फैला 

कर उड़ जाना है।।


दिव्या सक्सेना,कलम वाली दीदी

ग्वालियर-म0प्र0