रिश्ते या धन

रिश्तें वक्त के साथ बदलते रिश्तें,

कुछ धन -दौलत पर टिकते रिश्ते,

कभी टूटते ,बिखरते,सिसकते रिश्ते,

" बाप बडा़ न भैया,सबसे बडा़ रूपैया,

सरोवर की भाषा में

साहब नाज़ था बड़ा अपनी डिग्रियों पर,

इज्ज़त भी थी बडी़ विद्वानों में,

जुगाड़ के जमाने में

आँख खुली तो सून्य,

सिर्फ इज्ज़त से पेट नहीं पलता है,

पालने को पेट, कमाने के  लिए इज्ज़त 

धन चाहिए,सर ढकने को छत चाहिए,

तन पर वस्त्र चाहिए,

अपने भी गैर हो जाते हैं,

खाली हाथ होने पर,

तजुर्बा जो मिला है जीवन में

इंसा गर  संपन्न है,धन से परिपूर्ण है तो

बन जाते हैं रिश्ते बहुत,

कड़वा है पर सत्य है,

कुछ बेगाने भी अपने हो जातें हैं,

बिन रिश्तों के भी दिल में बस जाते हैं,

जो स्वार्थ बिना रिश्ते निभाते जाते हैं,

कुछ रिश्ते पानी के बुलबुले से छू.मंतर हो जाते हैं,

जीवन जीने के लिए एक सिक्के के दो पहलू

होते हैं,

रिश्ते और धन दोनों ही जरूरी होते हैं।


सुनीता सिंह सरोवर

देवरिया-उमानगर

शिक्षिका