पानी से "पानी" बन जाना है प्रेम...

मंजिल पर पहुंचें

या न पहुंचें यात्री का सफर नहीं है प्रेम ,

कभी-कभार

इच्छाओं की फ़िक्र किए बिना 

चलते चले जाना भी है प्रेम !!

किसी बती-बताई पहेली के

रटे जवाबों सा भी नहीं है प्रेम ,

बल्कि एक रास्ता

जो बनता चला जाता है

ऊंचे-नीचे आवागहों पर

खुद-ब-खुद

मंजिल की परवाह किए बगैर ,

उसपर चलना भी है प्रेम !!

सिर्फ ठहरे रह जाना

जायकेदार किस्से-कहानियों में 

- ऐसा कब है प्रेम ,

दिन भर की झक-झक

रूठने-मनाने के चुहल भरे क्षणों को जीना है प्रेम !!

सिर्फ मन की सुखद कल्पनाओं का 

शाश्वत होते रहना ही नहीं है प्रेम ,

राह तकती आंखों का इंतजार भी है प्रेम !!

सुनों

जन्मोंं-जन्मों तक एक संग जीना नहीं है प्रेम ,

लौटना हर बार पुनर्जन्म लेकर

बेपरवाह बारिश की तरह ,

और घुल जाना मिट्टी में ,

पानी से "पानी" बन जाना है प्रेम !!

नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश , मेरठ