मानव की मनोदशा

पत्थरों के जंगल में,

पत्थर बन गया हूं मैं।

आगे बढ़ने की दौड़ में,

ठोकर खा रहा हूं मैं।

राहों के जाल में,

भटक रहा हूं मैं।

ऊंची उड़ान के मोह में,

डूब रहा हूं मैं।

एकांत के साथ में,

नाराज हो गया हूं मैं।

वीरेन्द्र बहादुर सिंह 

जेड-436ए, सेक्टर-12,

नोएडा-201301 (उ0प्र0)

मो-8368681336