सफ़र

गुज़रा  ज़माना, यूँ  जीते - जीते

उलझती गई मैं, सुलझते-सुलझते


कभी मनचाहा, कभी अनचाहा

सँजोती गई मैं, बसर करते-करते


कभी चोट खाई, कभी मात खाई

बिखरती गई मैं, सँभलते-सँभलते


कभी महफ़िलों में, कभी उत्सवों में

तनहा रही मैं, मग़र हँसते-हँसते


कभी कोई आशा, कभी इक निराशा

सिमटती गई मैं, सब्र करते-करते


कभी ये सँवारा, कभी वो सँवारा

थक सी गई मैं, जतन करते-करते 


सफ़र लम्बा हो, या छोटा सफ़र हो

कट जाएगा यूँ ही, बस चलते-चलते !!


सुभषिणी विश्नोई

पंचकुला

हरियाणा