मैं पहुंचा नहीं वहां, और घर लौटा भी नहीं..

एक शहर, हर रात सपनों में देखा करता है एक गांव..

इक नीम जो तर-बतर है सावन में, पर भीगा भी नहीं !!


मैं चला हूं जबसे इस सफर पे, रास्ते खत्म होते नहीं

यूं तो शिकायतें हैं उससे बहुत, पर मैं खफा भी नहीं!!


है कभी धूप तो कभी रात, न मैं सोया, जागा भी नहीं

हूं शहर बेचैनियतों भरा, सही से मुस्कराया भी नहीं !!


देखा करता हूं हर रोज़ मैं उसे बहुत ही "उम्मीदों" से 

न जाने कैसा है वो, न हमारा है और पराया भी नहीं !!


मैं उस शख्स सा, तरशता फिर रहा जो कागज़-कागज़

बेशक दर्ज़ हूं किताबों में, किसीने कभी पढ़ा भी नहीं !!


मौजूदा हालात..मेरे ही करम हैं, या वक़्त की दी सज़ा

बहुत बेबस हूं, खोके अपनों को जी भर रोया भी नहीं !!


नहीं पता था, अजनबी ये रास्ते मुझे ले जाएंगें किधर

कहूं क्या, मैं पहुंचा नहीं वहां, और घर लौटा भी नहीं !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश , मेरठ