और हाथ खाली रह गया

बात मई 2016 की है उस समय मैं प्राथमिक विद्यालय रैपुरा जनपद चित्रकूट के हेड मास्टर के पद पर कार्यरत थी, स्कूल में मै हेड और दो शिक्षामित्र उस समय कार्यरत थे स्कूल में बच्चों की संख्या लगभग 200  होने की वजह से सभी को अधिक जिम्मेदारी का निर्वाहन करना पड़ता, एक दिन विद्यालय खुलते के बाद मैं कक्षा 3 में बच्चों की उपस्थिति लेने पहुंची, उपस्थिति लेते समय "हेमा" नाम पर नजर रूकती है जो कई दिनों से स्कूल नहीं आई, वह पढ़ने में काफी होशियार 9 साल की नटखट सी प्यारी सी बच्ची थी, मेरे द्वारा बच्चों से न आने का कारण पूछा गया , तो उसके पड़ोस के बच्चों ने बताया वह बहुत ज्यादा बीमार है इसलिए स्कूल नहीं आ रही, मैंने दो बच्चों को उसके घर से किसी को बुला कर लाने को कहा, और स्कूल में पेंटिग आदि का काम चल रहा तो अन्य कार्याें में व्यस्त हो गई।

   कुछ देर बाद उसकी मां आती है और रोती हुई बताती है "हेमा"  बहुत ज्यादा बीमार है गांव के डॉक्टर ने कहा है कि कहीं बाहर ले जाओ इसे कोई दिल की बीमारी है, और जब घर में दो वक़्त का खाने को ढ़ंग का नहीं तो कहां ले जाएं, हमको तो यही अफसोस रहेगा कि हम अपनी बिटिया को कहीं दिखा भी नहीं पाए"

 मेरे द्वारा उसकी बातों को सुना और मात्र सांत्वना दी गई, और स्कूल के कार्य में व्यस्त हो गई।

  वह शनिवार का दिन था, पेंटिग के कार्य के लिए रविवार को भी स्कूल जाना था उसी दिन स्कूल में 8 बज चुके थे, किसी तरह घर पहुंची, और जब फ़्री होकर बिस्तर पर सोने के लिए गई तो हेमा की मां की बातें दिमाग़ में घूमने लगी कि हमें यही अफसोस रहेगा कि हम उसे कहीं दिखा भी नहीं पाए, रात यही सोचते हुए बीती कि दिल की बीमारी का मामला है 2-4 हजार रूपए की मदद से भी इलाज़ संभव नहीं, किस तरह उस बच्ची की मदद कर उसके मां के मन के अफसोस को दूर किया जा सके कि कहीं दिखा नहीं पाए, बाकी जीवन मरण ईश्वर के हाथ है।

मन में यह ख्याल आ रहा था जनपद में इतने सारे शिक्षक हैं अगर 100-200 रुपए की मदद सब कर दें उसकी मदद की जा सकती है, फिर वहीं यह ख्याल रोक देता कि एक साधारण शिक्षक जिसे जनपद में कोई जानता नहीं उसके कहने पर कोई मदद क्यों करेगा।

  सुबह इसी कशमकश में हुई और शिक्षिका ने सोचा एक साधारण शिक्षिका के कहने पर नहीं लेकिन कोई ऐसा व्यक्ति मदद की अपील करे जिसे जनपद में शिक्षक जानते और मानते हो।

  शिक्षिका ने जनपद के प्राथमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष श्री अखिलेश पांडेय से सर्वप्रथम अपील के लिए कहा, श्री अखिलेश पांडेय जी ने ध्यान सुना और इस नेक कार्य में अधिक से अधिक सहयोग की संत्वना दी।

 मैं कुछ समय पश्चात सुबह स्कूल गई और लगभग दो घंटे बाद जैसे ही अपना फोन देखा तो प्रथम अपील का msg अध्यक्ष जी द्वारा सभी शिक्षक ग्रुप में कर दिया था, और कई शिक्षक भाई बहनों के सहयोग मैसेज भी आ चुके थे, तभी मेरा मन में एक उम्मीद की किरण जागी, कुछ अध्यापक उसी समय स्कूल आकर ही सहयोग राशि दे गए, और कुछ ने पैसे देने के लिए स्थान पूंछा, तो अध्यक्ष जी और अन्य शिक्षकों की सहमति से एक पार्क में शाम को मिलने का समय तय किया गया, शाम को मैं

हेमा और उसके माता पिता को लेकर सुनिश्चित स्थान पर पहुंची,

 जहां जनपद के अन्य शिक्षक/शिक्षामित्र/ अनुदेशक भी मौजूद थे सभी ने हेमा को अपनी बेटी बना कर इलाज़ कराने का प्रण लिया और बढ़चढ़ कर सहयोग किया और आगे भी सहयोग करने की बात कही।

  मैं दूसरे दिन मेरे पति श्री नफीस सिद्दीकी और अन्य शिक्षक श्री विनय शुक्ला जी ( जो दिव्यांग है अपने पैरों खड़े हो नहीं सकते वह पूरा दिन हॉस्पिटल में बैसाखी पर खड़े थे) प्रयागराज के 'सरस्वती हार्ड केयर हॉस्पिटल ले कर पहुंचे, वहां  सारे चेकअप के बाद पता कि हेमा के दिल में छेद है और वाल्व भी खराब है, ऑपरेशन में लाखों का ख़र्च आयेगा।

 वहां से हेमा को लेकर वापस हुए और जनपद के सहयोगी साथियों को सारी बात बताई गई, हम सभी शिक्षक सिर्फ हेमा को बचाने की मुहिम में लगे थे, जनपद के पत्रकारों ने इस खबर को समाचार पत्रों में प्रकाशित किया, कर्मचारी/अधिकारी पत्रकार भाई बेसिक परिवार के साथ अन्य विभाग भी हेमा की मदद के लिए आगे आए, कई ऐसे नींव के पत्थर बने (श्री विजय शुक्ला आदि) जिनका सहयोग हर कदम पर मिलता और वो शान्त रहकर कर अपना काम करते।

    उसी समय रायपुर  (छत्तीसगढ़) के सत्य साईं हॉस्पिटल की जानकारी हुई,  उसी समय बिना देर किए सबकी सहमति के बाद मैं अपने पति के साथ हेमा को लेकर रायपुर पहुंचे, जहां हेमा का सफल ऑपरेशन हुआ, और हेमा स्वस्थ होकर वापस आईं, सभी सहयोगी साथी बहुत खुश थे नन्ही कली दिन ब दिन खिलने लगी, हर तीन माह में हेमा को चेकअप के लिए रायपुर भेजा जाता, डॉक्टर ने बताया था बड़े होने पर एक ऑपरेशन कर फिर से वाल्व बदलना होगा।

  समय बीतता रहा हेमा के इलाज़ के लिए कुछ शिक्षकों ने मिशन स्माइल ग्रुप बना लिया और जब पैसों की जरूरत होती उस ग्रुप के लोग तुरंत पैसों की व्यवस्था कर देते, 

समय बीतता रहा 5 साल इसी तरह हंसी गुजर गए, मेरा भी ट्रांसफर दूसरे स्कूल में हो गया था लेकिन हेमा की दवा आदि की व्यवस्था निरन्तर होती रही।

 कोरोना काल आया, ट्रेनों का संचालन बंद था कहीं आना जाना मुश्किल।

 अभी कोरोना से हालात ठीक हो रहे थे

 एक दिन अचानक  हेमा की मां ने मुझे बताया कि हेमा कि हेमा को बुखार है हम लोग उसके रायपुर भेजने की तैयारी करने लगे, तभी उसकी हालत खराब हो गई और उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, उसी रात सुधार नहीं होने पर उसे प्रयागराज में आई सी यू में भेज दिया गया, हम लोग थोड़ा सा आराम मिलने की आस लगाए थे जैसे आराम मिले तुरन्त रायपुर भेज दें, लेकिन हेमा की तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ, और पाँच दिन जिदंगी से जंग लड़ते लड़ते हेमा हम सब को 25 जुलाई 2021 को छोड़ कर चली गई, हम सब हार गए, शिक्षकों का मिशन स्माइल फेल हो गया है, हर आंख में सिर्फ आंसू थे, नन्ही सी परी का यूं दुखद अन्त हम सब ने इसकी कल्पना भी नही की थी, हम सबके इतने प्रयास के बाद हम सब के हाथ खाली रह गए।।

शहनाज़ बानो (स०अ०)

उच्च प्राथमिक विद्यालय रैपुरा

जनपद -चित्रकूट