॥ बारिस की बूंद ॥

इस बारिस की इस बुदों में

तन मन को भीग जाने दो

जो अगन लगी है इस तन में

उस अगन को बुझ तो जाने दो


इस बारिस की इस बूदों में

पूर्वाई की झौंका तो आने दो

ऑचल  उड़ उड़ जाये बरखा में

ऑचल को हवा में बहक जाने दो


इस बारिस की इस बूदों में

अल्हड़ बरखा को मचल जाने दो

धरती जो प्यासी है अब तक

धरती की प्यास को मिट जाने दो


इस बारिस की इस बूदों में

मेघों को उमड़ कर छा जाने दो

बिजली नभ पर जब चमक उठे

प्रियतमा को बाँहों में छुप जाने दो


इस बारिस की इस बूदों में

जमी आसमाँ को भीग जाने दो

मौसम बेईमान हो आ जाये

मौसम को खुशगवार हो जाने दो


इस बारिस की इस बूदों में

परदेशी को खबर हो जाने दो

इक दूजे के बाँहों में सो जाये

अय सावन बदरी को छा जाने दो


इस बारिस की इस बूदों में

दादुर को गीत तो गाने दो

नदियों में जवानी आ जाये

अय मेघ बरखा को बरस जाने दो


इस बारिस की इस बूदों में

पानी को जुल्फों में छुप जाने दो

पानी की बून्द टपक टपक कर

मोती को जमीं पर मिट जाने दो


इस बारिस की इस बूदों में

इश्क की तपिश चढ़ जाने दो

जब तक दिलवर ना जा पाये

सावन तुम गरज बरस जाने दो


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार