जीवन की राहों में

स्वारथ के सम्बंध जगत में किसको सच्चा मीत मिला।

धन पद वैभव की स्तुति में प्रत्येक छंद हर गीत मिला।

जीवन भर साथ निभाने की कसमें खाने वाले भी,

समृद्धि गयी, सब दोस्त गये; रिक्त मन, उर भयभीत मिला।।


अपनेपन की चादर ओढ़े, लोग मुझे हर राह मिले।

दुर्दिन में निकट न आते, जब उर पीड़ा तन दाह मिले।

वाणी से जिनके नेह टपकता नयनों से शीतल जल,

कभी न उनके मन की गहराई, सपनों की थाह मिले।


जीवन की राहों में सबको सुखकर साथ नहीं मिलता।

बढ़कर थामें गिरते मन को, ऐसा हाथ नहीं मिलता।

मिलते जग में पग-पग बातों में नेह लुटाने वाले,

सूने नयनो में नेह भरें; वो मन, माथ नहीं मिलता।।

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प्रमोद दीक्षित मलय

शिक्षक, बांदा (उ.प्र.)