बोलो क्या करोगे

हम फँसे मझधार बोलो क्या करोगे।

झील  झरने  खार  बोलो क्या करोगे।


छोड़कर  बेटा  गया माँ बाप  को  है,

जिंदगी  दुश्वार   बोलो   क्या  करोगे।                          


सत्य पर जब ये ज़ुबाने  चल न पायें

म्यान   में तलवार बोलो  क्या करोगे।


बेटियों   की    आबरू से खेलते  जो,

हैं  वो  पहरेदार   बोलो   क्या करोगे।


बिक रही हर  हाट में जब नौकरी तो,

डिग्रियाँ दो- चार   बोलो क्या करोगे।


मुल्क सौंपा था बड़ी  उम्मीद से  पर 

लूटती  सरकार   बोलो  क्या  करोगे। 


नफरतों की चल रही हों आधियाँ तो,

तुम नवल से प्यार बोलो क्या करोगे। 


निशा सिंह" नवल" लखनऊ