दुनिया का भविष्य

 क्या मूक आत्माए भरेगी खामयाजा हमारी गलतियों का?हमारा भविष्य भरेगा खामियाजा हमारी सब की करनी का।हमने ही जुल्म किया है ,कुदरत के स्त्रोतों पर।नदियों में कारखानों में उस्तर्जित रसायनों को उड़ेलते है,धरती में प्लास्टिक  का भंडारण करते है।उत्खनन करके भूमि का संतुलन हम खराब करते है,विस्तारके लालच में   हरेक प्रकार के अस्त्र और शस्त्र  बनाके दुनिया के उपर बरबादी के बादल घेरने वाले इन मनुष्यों की ही करतूत है।

     यही है मेरा सवाल सब से।करोना का तो जो हाल है उसे दुनिया  जानती है,पहले वयस्को पर कहर टूटा ,बाद में युवाओं पर अब कहते है हमारे बालधन पर खतरा होगा।अभी तो करोना के कहर उभरे नहीं और तोकते  आ गया, तोकते जिसका मतलब छिपकली होता है,जो धीरे से आके जपट्ट। मारके शिकार कर लेगी।वोही तो हुआ,कितने घर गिर गए ,जहाज डूब गए,बहुत ही नुकसान हुआ समंदर किनारे पे बसे शहरो और गांवों में जो हुआ , इनके समाचारों से मीडिया भरा पड़ा है,बहुत आहत होती है भावनाएं।

रोज सुबह चहचहाती चिड़ीयो की आवाज के साथ दिन शुरू होता था ,आज वो चहचहाट गायब है मेरे छोटे से बाग से,न ही कोयल कूकने की आवाज आई है  न ही कहीं दूर से।दिल उदास हो गया ये देख कर।

        कितने घर गिरे ,गांव में पानी भरा , कितनी मोटर गाडियां बही या डूबी ,पर किसी भी अखबार ने उन मूक प्राणियों के बारे में कुछ  नहीं लिखा जिनके घोंसले पेड़ के साथ में ही गिर गए ,बच्चे उसी घोसलों में थे। कौन खबर लेता है मूक पशु – पक्षियों की।

क्या कसूर था वो वन्य पशुओं का जो बह गए होंगे ये समंदरी सैलाब में।खड़ी फसलें पानी की मार कैसे जेल पाएगी ,खत्म हो जाएगा उनका मालिक जिसके जीवन का आधार यहीं फसल थी।खेतो में फसलों के साथ  जीतने भी जीव पल रहे थे उनका भी अंत हो गया होगा।

    क्या कुदरत अपना संतुलन का कानून लगा रही है दुनिया पर,अगर हां, तो दंड उसको दो जिनकी गलती है,उनको क्यों जो शिकायत भी नहीं कर सकते।क्यों नहीं बनती ऐसी अदालतें जहा सिर्फ गुनहगार को ही सजा हो नकी बेकसूर को दंड मिले।


 जयश्री बिर्मी

 अहमदाबाद