दिल दुखे दाढ़ सा

बिन बरसे

जाना अषाढ़ का

दुखिया का दिल

दुखे दाढ़ सा ।


अंटी खाली

ब्याह बरेखे

दुख के दिन

आए अनदेखे ,


एक एक दिन

कटे न काटे

साल पड़ा पूरा पहाड़ सा।


मेड़ जोतते

हाथ छिल गए

माटी में सब

बीज मिल गए ,


घर के धान

पयारों अमिसे

खेत पड़ा खटखट उजाड़ सा।


सीवानों में

उड़े बगूले

अब क्या कजरी

कैसे झूले ,


आसौं सूखा

मुंह बाये है

पारसाल था कहर बाढ़ का।

दुखिया का

दिल दुखे दाढ़ सा ।।


 डॉ रविशंकर पांडेय