स्कूल से साक्षात्कार

बहुत दिनो बाद मन में

 स्कूल से मिलने का मन हुआ 

मन में हर्षातिरेक में कदम बढ़ चले 

घुसते ही कदम ठिठक गए 

एक आश्चर्य जो आँखों से निकल 

पूरे चेहरे पर फैलता आवरण बन 

फैल गया ,यही मेरा स्कूल था 

हाँ था ही अब नही 

कोई भी स्कूल हमेशा नही रहता 

जिसमें हम सीखते है 

कौतूहल भर जाने कितने बार 

क्या क्या सोचते कुछ समझते है 

बदल गई दीवारें 

वो जो मुझे पहचानती थी 

ना वो खुद तो नही बदली 

हल्की पीली सी वही की वही 

हाँ नज़रिया बदल गया उनका 

मुझे देख अजनबी सी घूरने लगी 

शायद वो भी मोर्डन हो गई है 

मिलना मिलाना जैसे फ़ालतू सा है 

बड़ा सा बगीचा जो सबसे पहले मिला 

खूब खिल खिला रहा था 

नए क़िस्म के फूलो से 

नज़र तो उसने भी फेर ली 

कही उसे उसकी पुरानी तस्वीर 

 ना दिखा दू

मुझे जाना था अंदर

 अपने सभी अध्यापक से मिलने 

ढूँढता रहा कोई तो दिख जाए 

पर नवीन प्राचीन के वक्त में 

कुछ भी नही मिलता शायद 

देखनी थी अपनी क्लास 

बढ़ चला उस ओर 

पढ़ रहे थे सभी हाँ मै भी बैठी थी 

मिसज़ सिंह की क्लास में सबसे आगे 

पूछ रही हैं मुझसे आगे क्या करना है ?

सोच रही हूँ कुछ ,पैर क्यू चिपक गए हैं ज़मीन से 

बहुत प्रिय थी जो याद अक्सर आतीं थी 

बताना था उनको 

आप जो चाहतीं थी कर रही हूँ आज 

तब क्यूँ नही थे मोबाइल 

रहती आज भी मेरे प्रयासों में 

चेतन अचेतन मन में 

सहसा किसी के पुकारने से वर्तमान याद आता है 

लाइब्रेरी मुझे बुलाने लगी 

बढ़ जाती हूँ ,छूना चाहती हूँ किताबों को 

एक बार ,जाने कितनी बार इनसे बात हुई है 

कैसा वक्त था हज़ार ख्वाहिशें 

गुनगुनाती थी सारी दुनिया अपनी थी 

हाथों में समाई 

कितनी सखियाँ साथ बैठ तैयार करते थे नोट्स 

लंच साथ बाते उम्मीद ख़ुशी काश भविष्य 

कितने पल सदियो  का हिसाब 

हाँ मिली यहाँ पहचान पुरानी पुस्तकें भी 

मिल गले दोहराना चाहती थी यादें 

बैठती हूँ कौने में चुप चाप 

सब महसूस करने के लिए 

चाहती हूँ घंटों बैठना ,पर नही जाना होगा मुझे फिर 

जैसे सालो पहले छोड़ गई थी 

एक फेरवेल पार्टी के बाद 

ना तब कदम उठ रहे थे घर जाने को ना आज ही 

आँखें उस दिन भी धुंधली थी 

कुछ दिखाई नही दे रहा था 

आज भी भीगी धुंधली हैं 

शायद यादों का बोझ ज़्यादा भारी है 

सवि शर्मा 

देहरादून