मलिन नहीं मैं

दुर्गा,काली,रणचंडी और अम्बा हूँ,

माँ, भार्या,बेटी और जगदम्बा हूँ।


सुख-दुःख की हूँ मैं सहगामिनी,

स्वार्थपरायणता पर आसीन नहीं मैं।


समाज के अभिलिप्सित नज़रों से आहत हूँ,

सुभग कर,निर्मल हूँ, मलिन नहीं मैं।


तुम कहते हो मैं अकेली सुरक्षित नहीं,

पर किनकी वजह से ये बताते क्यों नहीं?


दम्भ भरते हो आधुनिकता का,

विचारों से पुरुष ,नवीन नहीं तुम।


रिश्तों की लज्जा में अवगुंठित हूँ,

कमज़ोर,दुर्बल और बुद्धिहीन नहीं मैं।


रीमा सिन्हा (लखनऊ)