--- बचपन ----

लेकर  गाडा  लकड़ी  का 

आंगन  में  घुमा  करता  था 

भूर्र  भूर्र  की  मीठी  धुन 

मुंह  से  निकाला  करता  था 

जब  मैं  नन्हा  बालक  था 

दिन  भर  हस्ता  रहता  था 

खाना  खेलना  और  पडाई 

ये  नित  का  काम  था 

जब  हुआ  बडा  तब  

तब  समझ में  आया 

रचना  इस  संसार  की 

जो  ठीक  से  चला 

फल  उसने  पाया 

कहानी  है जीवन  की 


------   वीरेन्द्र  तोमर