पर्यटन के नये आयाम स्थापित कर रहा है रघुपुरगढ़, जलोङी जोत तथा तीर्थ स्थल सरेऊलसर

यात्रा वृतांत 

हिमाचल प्रदेश ने पर्यटन की दृष्टि से भारतवर्ष में ही नहीं अपितु विश्व भर में काफी पहचान बनाई है । बात चाहे यहाँ के पर्यटन स्थल की हो या तीर्थ स्थल की ।यहाँ ऐसे  तीर्थ स्थल है ,जो कि भारत के साथ साथ  दुनियाभर में प्रसिद्ध है । ऐसे ही पर्यटन व तीर्थ स्थल जिला कुल्लू के बाहरी सिराज क्षेत्र में स्थित है।  रघुपुरगढ़, जलोङी जोत व सरेऊलसर। यह तीनों स्थान बाहरी सराज के मुख्य पर्यटन स्थल है।  जलोङी जोत भीतरी सराज से बाहरी सराज को जोड़ने वाला प्रवेश द्वार भी है ।रघुपुरगढ़ की समुद्र तल से ऊंचाई करीब 12500 फुट लगभग हैं । यह बंजार व आनी तहसील के मध्य में है ।

रघुपुरगढ़ जलोङी जोत से लगभग तीन किलोमीटर दूर है ।

यहाँ की सुंदरता देखते ही बनती है। ठण्डी ठण्डी हवा यहाँ का शुद्ध वातावरण मानों कुछ पल यहाँ ठहरने को मजबूर कर देता है ।यहाँ से दूर दूर तक का विह़गम प्राकृतिक दृश्य इसे और भी खूबसूरत बनता है। यहाँ से हिमाचल के साथ साथ उत्तराखंड की चोटियों को भी देखा जा सकता है। यहाँ से पीर पंजाल व धौलाधार की रेंज देखी जा सकती है। रघुपुरगढ़ की सबसे खास बात यहाँ से चारों शिवधाम देखे जा सकते है। मणीमहेश, चूङधार, श्री खण्ड महादेव व किन्नर कैलाश के दर्शन किये जा सकते है। यहाँ प्राचीन समय में एक किला बना हुआ था। जो आज भी वर्तमान समय में देखे जा सकते है। कहा जाता है कि इस किले का निर्माण सुकेत के संस्थापक राजा वीर सेन ने 8 वीं शताब्दी में किया था। उन्होंने ने इसे यहाँ के ठाकुरों से जीता था और अपने अधीन कर लिया था । रघुपुरगढ़ भीतरी व  बाहरी सिराज के कुछ देवी देवताओं से भी जुड़ा है इन देवी देवताओं के मंदिर आज भी यहां है। जिसके दर्शन के लिए लोग दूर दूर से आते है। इस पर्वत चोटी के आंचल में मुख्य बाहरी सिराज के गढ़पति आराध्य देव श्री खुड्डी जी व भीतरी सिराज बंजार घाटी के आराध्य देव श्री श्रृंगा ॠषि जी है। यह देवता समय समय पर इस गढ़ की यात्रा करते है। यहाँ पर पंचवीर मंदिर भी है जिनको पांच पाङव माना जाता है ।कहा जाता है कि अपने अज्ञातवास के दौरान पाङव यहाँ रूके थे। यहाँ से कुछ ही दूरी पर है पाङु रोपा ( चुकदा सौर ) कहा जाता है, कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहाँ धान रोपा था। जो कि वर्तमान समय में देखा जा सकता है ।यहाँ की खात बात यह है कि जब इस जमीन में पाँव रखा जाता है या इसके ऊपर चलते है तो यह हिलने लगती है।

 सरेऊलसर तीर्थ स्थल 

जलोङी जोत से पांच किलोमीटर स्थित है सरेऊलसर 

यहाँ पैदल मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है सरेऊलसर में नाग माता बूढ़ी नागिन जी का वास है ।यहाँ प्राचीन पवित्र झील है। कहा जाता है कि नाग माता बूढ़ी नागिन जी इसी झील के अंदर है ।जो सच्चे मन से यहाँ मन्नत लेकर आता है। वह कभी खाली हाथ नहीं जाता है ।अपनी मन्नत पूरी होने पर माता को यहाँ घी अर्पित करते है । यहाँ लोग झील की परिक्रमा करके घी अर्पित करते है। यहाँ साल के छ: महीने श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता ।

सर्दी में भारी बर्फवारी के कारण यहां के कपाट बंद होते है।

वर्तमान समय में इन दोनों तीर्थ स्थलों पर स्थानीय व बाहरी श्रद्धालुओं की दर्शनों के लिए काफी  भीड़ है ।

अब यहाँ स्थानीय लोगों ने खाने व रात्रि ठहराव की अपने टेंट लगाकर  उचित व्यवस्था की है ।

सरेऊलसर भी मंदिर की सराय भी बनी है 

मैं निजी तौर पर स्थानीय श्रद्धालुओं से विनम्र निवेदन करता हूँ कि इन तीर्थ स्थल में सफाई का विशेष ध्यान रखें । यहाँ कुल्लू व शिमला से आसानी से पहुंचा जा सकता है यह दोनों तीर्थ स्थल आने वाले समय में काफी विख्यात हो सकते है और पर्यटन को चार चाँद लगा सकते है जिससे यहाँ के स्थानीय लोगों व युवाओं को घर द्वार पर अच्छा रोजगार प्राप्त हो सकता है जरूरत है तो सरकारी व प्रशासनिक कार्यों की ।


टी सी ठाकुर 

कारदार च्वासीगढ़ 

करसोग मण्डी हिमाचल प्रदेश