खुद को आर्थिक सुनामी के‌ लिए तैयारी कर लें...

खेती बचा कर रखें

बचत करें

हालांकि लिखने-पढ़ने से कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है फिर भी जिस तरह की अर्थव्यवस्था है और रूपए का जिस तेजी से अवमूल्यन हो रहा है वह यह इशारा कर रहा है कि दो या तीन साल‌ के भीतर आर्थिक सुनामी आने वाली है। यह कोविड से मरने की तुलना में ज्यादा पीड़ाजनक होगी। यह इसलिए होगी कि सरकार के हाथ में बहुत कुछ नहीं रह जाएगा। कोविड के लिए दवा, वैक्सीन, अस्पताल, आक्सीजन....की तैयारी हो सकती है लेकिन आर्थिक स्थिति का जो इंजन पटरी से फिलहाल उतर चुका है, वह दोबारा पटरी पर चढ़ाना आसान नहीं है क्योंकि जो ड्राइवर हैं उन्हें साइकिल चलाने का अनुभव है और वो इंजन का लीवर थाम चुके हैं। गंभीर भाषा में बात करूं तो  Ophthalmology के डाक्टर‌ को Gynaecology department में पोस्ट कर दिया गया है और मजेदार बात यह है कि मरीज यानी जनता खुद ही अपनी "तशरीफ़" खोलकर खड़ी है कि दर्द आंख में है लेकिन इलाज स्त्री एवं प्रसूति के डाक्टर से ही कराएगा। अगर जुमलेनुमा बात करूं तो-बंदर के साथ में कस्तूरा है और वो हर दिशा में चला‌ रहा‌ है।‌ हाल ही में

आईएमएफ के अनुमान आए हैं। ये अनुमान जो तस्वीर खींचते हैं वो चिंताजनक हैं।‌ आईएमएफ के अनुमान के अनुसार इस वित्त वर्ष में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 10.3 प्रतिशत गिरेगी। जबकि इसी आईएमएफ  ने जून में सिर्फ 4.5 प्रतिशत गिरावट की बात की थी, लेकिन अब आईएमएफ ने अपना अनुमान और नीचे सरका दिया है। आईएमएफ की रिपोर्ट तो यहां तक कहती हैं कि 10.3 प्रतिशत की गिरावट के बाद प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में भारत बांग्लादेश से भी पीछे हो जाएगा। 

चालू वित्त वर्ष के अंत तक मार्च 2021 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी गिर कर 1,877 डॉलर पर पहुंच जाएगी, जब की बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी में बढ़ोतरी होगी और वो 1,888 डॉलर पर पहुंच जाएगी।‌ आईएमएफ के अनुसार दक्षिण एशिया में श्रीलंका के बाद भारत ही सबसे बुरी तरह से प्रभावित अर्थव्यवस्था होने जा रहा है और अगर आपको इस रिपोर्ट को भी तमाम अन्य रिपोर्ट्स की तरह धर्म और हिंदुत्व के पागलपन की चाशनी में ही डुबोकर खाना है तो आपको बेशक कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि जहर बुझी मानसिकता और एनेस्थीसिया में जा चुके व्यक्ति को वाकई कोई फर्क नहीं पड़ता। भारतीय अर्थव्यवस्था पर यह आंकलन रूह कंपाने के लिए काफी है। कोविड ने तो दो-चार दिन में सफेद चादर ओढ़ा दी थी लेकिन आर्थिक तबाही आपको और आपके परिवारों को भूख से तड़पा-तड़पा कर मारेगी। 

विश्व बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बासु ने ट्विटर पर लिखा कि यह आंकड़े चौंकाने वाले हैं क्योंकि पांच साल पहले भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी बांग्लादेश से 25 प्रतिशत ज्यादा थी।  भारत की करेंसी से ऊपर इस वक्त  इंडोनेशियाई रुपिया और फिलिपींस के पेसो हैं।  इन दोनों ही करेंसी का प्रदर्शन डॉलर की तुलना में बेहतर रहा है, जबकि भारतीय रुपया कमजोर पड़ा है। निराश करने वाली अंतिम चार में से तीन करेंसियां एशियाई हैं।  इसमें ब्राजील के रियाल के अलावा थाईलैंड का बाथ, दक्षिण कोरिया का वॉन और मलेशियाई रिंगिट शामिल हैं।

इसलिए कह रहा हूं कि खेती की जमीन बचा कर रखिए। हाथ रोक कर खर्च करिए और कुछ कुछ बचाईए। हम वेनेजुएला की स्थिति में तो अभी नहीं है लेकिन तेजी से पहुंच रहे हैं। पेट्रोलियम से कमाई करने वाला धनाढ्य देश गलत नेतृत्व के कारण कैसे तबाह हो जाता है, इसका ताजा उदाहरण है वेनेजुएला।  दक्षिण अफ्रीकी देश वेनेजुएला ने 10 लाख बोलिवर का नया करेंसी नोट जारी किया है।  ऐसा फैसला आर्थिक तंगी और मुद्रास्फीति को पटरी पर लाने के लिए लिया गया है।  इतना बड़ा करेंसी नोट छापने वाला वेनेजुएला दुनिया का सबसे बड़ा देश बन गया है। 10 लाख बोलिवर की कीमत आधा अमेरिकी डॉलर यानी की भारतीय रुपये के अनुसार केवल 36 रुपये। जो लोग थोड़ा सा भी अर्थशास्त्र जानते हैं उन्हें अब अनुमान लग गया होगा कि वेनेजुएला की स्थिति कितनी भयावह है। बतौर एक भारतीय नागरिक दुख होता है जब विश्व बैंक भारत को विकासशील देशों की सूची से निकाल कर गरीब देशों की सूची में डाल देता है। दुख होता है जब हंगर इंडेक्स में भारत पाकिस्तान की बराबरी करने के नजदीक पहुंचता दिखता है। सरकार गर्व से जब कहती हैं कि वह 80 करोड़ जनता को अनाज मुफ्त में दे रही है!!!...यानी 125 करोड़ के देश में 80 करोड़ लोग इस हालत में पहुंच गये!.....हिटलर को पढ़िए उसने कहा था--"जनता को दो रोटी कमाने में ही फंसा दो और उसे ही वह अपना विकास समझे।".... जिन्हें लग रहा है कि वे आर्थिक सुनामी से सुरक्षित हैं वो लोग ऐसे मूर्ख हैं जो जलती हुई आग से यह विश्वास करके हाथ मिला रहे हैं कि आग की तासीर ठंडी है।‌ अगर आप संपन्न बिजनेसमैन हैं तो आप उपभोक्ता कहां से लाएंगे, जब उसके पास क्रय शक्ति ही नहीं होगी।‌ नौकरीपेशा हैं तो आपका वेतन कंपनी/सरकार काट कर आधा कर देगी तो आप क्या करेंगे? अपने शौक पूरे करेंगे या पेट पालेंगे? कुछ लोग कहते हैं उन्हें पेट्रोल/डीजल के दामों से फर्क नहीं पड़ता... लेकिन वह यह भूल जाते हैं कि इसका असर केवल आपकी गाड़ी की टंकी तक सीमित नहीं है। कृषि लागत बढ़ गई है, अनाज महंगा हुआ है, सब्जी मंहगी हुई है....। यानी आप भी घिर गये हैं लेकिन ईश्वर ने आपको सम्पन्नता दे रखी है इसलिए एहसास नहीं है लेकिन जब किसी देश की अर्थव्यवस्था तबाह होती है तो वो बहुत ख़तरनाक होती है। अराजकता चरम पर होती है। लूटपाट और अपराध चरम पर पहुंचता है। दुकानें व घर लूटे जाते हैं। और इन हालातों को आज तक दुनिया की कोई पुलिस तो छोड़ दीजिए सेना भी नहीं संभाल पाई है।‌

देश का बैंकिंग सेक्टर तेजी से चरमरा रहा है।‌ रिजर्व बैंक से अरबों रुपए सरकार ले चुकी‌ है। 28 से ज्यादा  बड़े उद्योगपति खरबों रूपए का चूना सरकारी बैंकों को लगाकर आराम से जा चुके हैं।‌ हाल ही में एक और बड़ी खबर आई है जो कोने में छपी और निकल गई। जाहिर सी बात है लव जिहाद की खबर नहीं थी इसलिए कोई मायने नहीं रखती थी। हम दो हमारे दो में से, एक उद्योगपति ने एक छोटे से देश की नागरिकता ले ली है। इसके मायने बहुत ही गंभीर हैं। जबकि यह उद्योगपति उंगलियों के पोर-पोर से कमा रहा है। जंगल, जमीन, समुद्र तट सब उसके हैं। हवा पर भी उसका अधिकार है तमाम हवाईअड्डे उसने खरीद लिए हैं लेकिन वो नागरिकता एक छोटे से देश की ले लेता है। हम दो हमारे दो में से दूसरा उद्योगपति अरबी मूल के एक शख्स को अपने बिजनेस से जोड़ता है और इधर हमारे देश की जनता पैनी निगाह से देख रही है कि रेहाना ने शिव कुमार से निकाह किया है कि नहीं और अब्दुल ने दिव्यांशी से कुबूल है...कुबूल है तो नहीं कर लिया। लेख खत्म करते-करते आत्महत्याओं का आंकड़ा भी दिए देता हूं। 

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी, 2019) की रिपोर्ट कहती है कि 2019 में कुल 1,39,123 लोगों ने आत्महत्या की जिनका रिकॉर्ड दर्ज हुआ। इन 1,39,123 लोगों में से 10.1% यानी कि 14,051 लोग ऐसे थे, जो बेरोजगार थे। इसका अर्थ यह भी होता है हर रोज लगभग 38 बेरोजगारों ने आत्महत्या की। बेरोजगार लोगों की आत्महत्या का यह आंकड़ा पिछले 25 सालों में सबसे अधिक है और इन 25 सालों में पहली बार बेरोजगार लोगों की आत्महत्या का प्रतिशत दहाई अंकों (10.1%) में पहुंचा है। 2018 में आत्महत्या करने वाले बेरोजगार लोगों की संख्या 12,936 थी। अगर हम एनसीआरबी के आंकड़ों को और गौर से देखें तो पता चलता है कि दिहाड़ी मजदूरों (23.4%), विवाहिता महिलाओं (15.4%) और स्व रोजगार करने वाले लोगों (11.6%) के बाद सबसे अधिक आत्महत्या बेरोजगारों (10.1%) ने ही की। यह आंकड़ा किसानों की आत्महत्या के भी प्रतिशत (7.4%) से कहीं ज्यादा है।अगर हम इसमें आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों का प्रतिशत (7.4%) भी जोड़ दें तो यह आंकड़ा और भी अधिक हो जाता है। तालियां पीटने वालों इन आंकड़ों में कभी आपका नाती, पोता या आप खुद भी शामिल हो सकते हैं।

(पवन सिंह)