शिखर पर बच्चों की पहुंच के लिए अभिभावकों का बढ़ता दबाव

18 घण्टे रोज पढ़ती है वो। 

मेरी सहेली सुनीता जो मेरी रूममेट है HCS की तैयारी कर रही है।

12 से 5 सोती है और दिन के बचे एक घण्टे में खाना, नहाना,चाय सब काम निपटा देती है।

कई बार तो खाना खाते,चाय पीते समय भी उसके मोबाइल में यूट्यूब पर कोचिंग वीडियो चल रहे होते है।

अक्सर उसके मम्मी पापा के फोन आते है 10 मिनट बात करें तो 8 मिनट सिर्फ इसी बात पर निकलते है कितना पढ़ी आज, इस बार मेन्स निकल जायेगा न ?? 

लास्ट चांस है तेरा और हमारे लाखों रुपये दांव पर लग चुके है बेटा !!

और वो हर बार पढ़ रही हूं मां कहकर फोन काट देती है।

डिप्रेशन के पहले चरण की और बढ़ती हुई दिखाई देती है मुझे।

2 सालों में कभी हंसते नही देखा उसको।

सर्दियों में अक्सर नहाना भी मिस कर देती है।

रूम का सब काम मैं करती हूं ताकि उसे ज्यादा से ज्यादा वक्त मिले पढ़ने को।

फिर भी तनाव में रहती है अंतिम मौका है उसका। दो बार प्री क्लियर कर चुकी है मैन्स में रह जाती है। सारा कमरा किताबों और नोट्स से भरा हुआ है आंखे सूजी रहती है उसकी।

ऊपर से रोज मम्मी पापा का प्रेशर !!!

कभी कभी सोचती हूँ क्यों भारतीय माँ बाप अंको और सफलता के पीछे इतना भागते है ???

एग्जाम से पहले बच्चे पर खूब प्रेशर बनाया जाता है कि वो अधिक से अधिक अंक लाये।

लेकिन अधिक अंको से क्या आपके बच्चे की काबिलियत का पता लग जाता है ??

2 बच्चे सालभर पढ़ते है अकबर कब मरा, बाबर कब मरा,

फलाना युद्ध कब हुआ,धिमकाना युद्ध कब हुआ ??

फिर एग्जाम में इनसे सम्बंधित सवाल आते है 

एक बच्चा 100 में से 100 सवाल के सही जवाब देता है

एक 100 मे से 90 के सही जवाब देता है।

जिसकी याददाश्त तेज थी उसने अधिक उतर दिये जिसकी थोड़ी कम थी उसने कम उतर दिए।

तो क्या इसे काबिलियत का आधार मान लिया जाए ??

ये तो काबिलियत के सिर्फ एक गुण याददाश्त का टेस्ट हुआ न ?? 

इसका(याददास्त) सफलता और दिमाग से क्या लेना देना ??

और काबिल आदमी में 100 तरह के गुण होते है !!

तो सिर्फ एक गुण के आधार पर अपने बच्चे का आंकलन क्यों ??

और वेसे भी अकबर,बाबर कब मरे, कब कौनसा युद्ध कब हुआ ये बातें निजी जीवन मे कभी काम आती है ??

अगर उसी स्कूल में कार ड्राइविंग, घुड़सवारी, खाना बनाना, इलेक्ट्रॉनिक का काम, गाड़ी,मोबाईल की रिपेयरिंग, सिलाई का काम, नैतिक गुण, विपरीत परिस्थितियों में निर्णय लेना इत्यादि सिखाये जाते और उनका टेस्ट लिया जाता तो क्या पता आपका बच्चा 100 अंक वाले से 100 गुना बेहतर होता ??

और ये सब हमारे जीवन मे हर वक़्त काम आने गुण है।

मैंने अपने जीवन मे ऐसे बस कंडक्टर देखे है जो अगर समाज का एक कोई अपराध का केस आ जाये तो DSP लेवल के अधिकारी से जल्द उसको हल करदे।

और ऐसे DSP देखे है जिनको दीवाली की स्पेल्लिंग लिखनी नही आती।

फिर आपके बच्चे में क्या गुण है ये क्यों नही देखना चाहते आप।

बस रट्टू तोता बनाकर क्लर्क मास्टर आईएएस बनाना है

कल को अति दबाव में आपका बच्चा कोई गलत काम मे फंस गया तो क्या करोगे ??

आपको पंजाब की एक लड़की की कहानी बताती हूँ 

अपने माँ बाप की इकलौती बेटी थी

वो भी बड़े सपने लेकर चंडीगढ़ में आई थी कॉलेज में पढ़ती थी। अधिक अंक लाने के लिए प्रेशर में रहती थी। सहेलियों के कहने पर की ये खा लो रिलैक्स हो जाओगी--इसी में चिट्टे की गिरफ्त में आ गई।

घरवालों को पता लग गया थे कि लड़की नशा करने लग गयी है लेकिन ये नहीं पता था कि वो चिट्टे की गिरफ्त में आ गयी है।

लड़की को जहां नाड़ी मिलती इंजेक्शन लगाती।

करते करते तमाम नाड़ियां डेड होती चली गयी।

नर्सिंग का कोर्स करती थी वहां माहौल खराब न हो इसलिए उसे कॉलेज से निकाल दिया गया।

अकेली को नशा और ज्यादा याद आता।

सब पैसे खत्म हो गए उसके सेविंग के ??

चोरी छिपे घर की चीजें बेचने लगी। 

पैसे कम पड़े तो खुद नशा बेचने लगी ताकि खर्च निकले उसके नशे के लिए।

अब तक सिर्फ समाज ही शोषण कर रहा था अब प्रशासन भी नशे बेचने वाली के पीछे पड़ा था।

कोई लड़का होता तो शायद इन सब के अभाव में नशा छोड़ने को शायद मजबूर हो जाता। लेकिन लड़की होने का एक नुकसान ये भी है कि उसके पास बेचने के लिये एक जिस्म भी होता है। आखिरी दांव भी खेलने लगी। नशे लेने जाती तो समाज की घूरती नजरें उसे चुभती पर मरती क्या न करती ??

समाज मे नशेडन और वेश्या के नाम से मशहूर हो गयी।

एक दिन खूब कड़ाके की सर्दी में सुबह 5 बजे स्कूटी उठाकर नशा लेने निकल पड़ी 150 किलोमीटर दूर।

ठंड और नशे की कमी से पैर दर्द कर रहे थे धुंध छाई थी और इसी में उसकी स्कूटी सामने गाड़ी से टकरा गई।

गाड़ी वाला भाग गया, वो सड़क पर लहूलुहान पड़ी थी। बहुत चोटें आई खून से सड़क लाल थी।

पर लड़की के दिमाग में सिर्फ एक ही बात थी किसी तरह नशे लेने वाली जगह पहुंच जाउँ।

आसपास कुछ लड़कों ने मदद की पेशकश की पर उसने मना किया और स्कूटी लेकर पहुंच गई।

नशे वाले घबरा गए और उसे पट्टी करवाने की कहने लगे।

वो कहने लगी पहले चिट्टा दो बाद में सब देखेंगे।

चिट्टा खाकर ही दवा लेने की सुध आई।

जब भी लड़की घर से बाहर होती तो मा को यही डर रहता कि या तो कहीं सड़क पर गिरी मिलेगी या थाने से फोन आएगा।

एक रात को नशे की ओवरडोज में स्कूटी लेकर निकली तो 2 किलोमीटर बाद जाकर सड़क पर गिर गयी।

किसी ने देखा तो पुलिस को काल किया। वे हस्पताल छोड़ गए।

मा बच्ची को ढूंढ ढूंढ कर पागल हो गयी थी।उसे डर था शायद इस बार बच्ची की मौत हो गयी।

हस्पताल में 2 दिन बाद होश आया तो उसने माँ का नंबर बताया। रोते हुए मां वहां पहुंची। इतना दर्द में थी लड़की की अब मौत की दुआ मांगने लगी थी

हस्पताल में ही बाथरूम में छुपकर लड़की तीन इंजेक्शन एक साथ लगा गयी ताकि ओवरडोज से उसकी मौत हो जाये।

दर्द बढ़ा तो बेहोश हो गयी। कुछ देर बाद आंखे खुली तो माँ की गोद मे थी हस्पताल के फर्श पर।

इसी सदमे में पिता चल बसे। 

ये लड़की को अंदर तक तोड़ गया। मां अकेली थी लड़की को बचाने के लिए रिहैब सेंटर में डाल दिया। 

किस्मत अच्छी थी उसका नशा छूट गया।

एक और लड़की थी ऐसे ही पढ़ते पढ़ते नशे की गिरफ्त में आई।

घरवाले नशा मुक्ति केंद्र में छोड़कर आते तो वे केंद्र वाले 4 दिन में उसे घर वापिस फेंक जाते। 

आज उस लड़की के माँ बाप उस बच्ची को बेड़ियों से बांधकर रखते है ताकि वो भागकर कहीं नशा न लेने चली जाए।

क्या आप भी अपने बच्चों का ऐसा भविष्य देखना चाहते हैं।

क्यों हर बार एग्जाम में अधिक अंकों के लिए प्रेशर बनाते है

क्या सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली, लता मंगेशकर, पीटी उषा,गीता फोगाट, मिल्खा सिंह आदि को पेपर में अधिक अंक लाने की जरूरत पड़ी ???

सिर्फ एक ही चीज़ के लिये बच्चों के क्यों पीछे पड़ते हो।

जहरीला खाना खाकर सब डिप्रेसन में घूम रहे है यार।

जीवन मे करने के लिए बहुत कुछ है 

सरकारी नौकरी ही जीवन नही है।

और सफलता पाना इतना भी जरूरी नही की हम अपने बच्चे खो दें।

और अंत मे समझ न आये तो सरल भाषा में :

उनसे पूछो यार जिनके बच्चे नही है रोज प्रार्थना करते है ईश्वर से कि-भगवान सिर्फ बच्चे दे दो हमेशा उनकी सुनेंगे चाहे वे कभी स्कूल न जाएं, हम घर पर ही उनको पढा देंगे। 

कभी कोई उम्मीद न रखेंगे उनसे।

बस बच्चा आंखों के सामने खेलता रहे इतना ही काफी है।

रितिका सिहाग