कोरोना में कुदरत की आपदा - हर साल की वही कहानी - क्यों? रुकता है बारिश का पानी

गोंदिया - वैश्विक रूपसे कोरोना की तीसरी लहर की दहलीज पर पहुंची स्थिति से मुकाबला करने के लिए वैश्विक स्तर पर हर देश रणनीतिक रोडमैप तैयार रखे हुए हैं जबकि इंडोनेशिया, ब्रिटेन, ब्राजील इत्यादि देशों में तीसरी पहुंच चुकी है, जिससे मुकाबला चल ही रहा है कि कुदरत की मार आसमान से बारिश रूपी मुसीबत और लैंडस्लाइड से भी वैश्विक आपदा से तबाही मच रही है...। साथियों बात अगर हम भारत की करें तो टीवी चैनलों के अनुसार दिनांक 18 जुलाई 2021 को और पहले महाराष्ट्र, बिहार, उत्तराखंड, गुजरात, राजस्थान, के अनेक शहरों में भारी बारिश, भूस्खलन, लैंडस्लाइड हुआ जिससे अनेक रिहायशी इलाकों में पानी भर चुका है। कई चार चक्का दो चक्का गाड़ियों को पानी में तेज रफ्तार से बहते दिखाया गया है। 

लोगों के घरों में भी पानी लबालब घुसा हुआ है। कई व्यक्तियों की जाने चली गई है...। बात अगर हम महाराष्ट्र की करें तो, मुंबई में तेज हवाओं के साथ भारी बारिश ने तबाही मचा दी है, जिसमें अब तक कम से कम 32 लोगों की मौत हो चुकी है। रविवार को शहर में लगातार बारिश हुई जिसके कारण दो जगह भूस्खलन की घटना भी सामने आई। इसके अलावा दो जगह बिजली गिरने की तो एक जगह दीवार गिरने से 16 साल के लड़के की जान चली गई। उधर, चेंबूर और विक्रोली में भूस्खलन के कारण दीवार गिरने की दो अलग-अलग घटनाओं में 29 लोगों की मौत हो गई।लगातार हुई भारी बारिश के कारण देश की आर्थिक राजधानी के कई इलाकों में जलजमाव की परेशानी और यातायात बाधित है। 

बारिश से हुई मौतों पर पीएम ने दुख जताया और इसीके साथ पीएम कार्यालय ने मृतकों के परिजनों को पीएम राहत कोष से दो 2 लाख़ रुपए और घायलों को 50-50 हज़ार रुपए देने की घोषणा की गई... साथियों बात अगर हम उत्तराखंड की करें तो 19 जुलाई 2021 की और उसके पूर्वभी वहां लैंडस्लाइड और जोरदार बारिश से नागरिकों की जान सांसत में फंसी हुई है। रोड विशाल रूप से क्षतिग्रस्त और जाम पड़े हुए हैं। उसी तरह बिहार, गुजरात, राजस्थान में भी जोरदार बारिश ने कहर ढाया है और पानी चौराहों, रास्तों में भरा पड़ा है ऐसा ही चैनलों में दिखाया जा रहा है...साथियों बात अगर हम इस कुदरत की आपदा की करें और अधिकतम शहरों में पानी भरने की करें तो यह, हर साल की वही कहानी, आखिर क्यों रुकता है, बारिश का पानी...साथियों मेरा यह निजी मानना है कि इसके लिए माननीय ख़ता ही जवाबदार है। 

क्योंकि पर्यावरण के साथ छेड़छाड़, बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों का अवैध-अवैध खनन, रणनीतिक नगर नियोजन संरचना में खामी, इत्यादि मानवीय हस्तक्षेप शामिल है...साथियों बात अगर हम पश्चिमी यूरोपीय देशों की करें तो वहां भी अनेक शहरों में भयानक बाढ़ टीवी चैनलों पर दिखाई जा रही है और करोना में कुदरत की मार से अमेरिका में करीब 12 शहरों के करीबी जंगलों में आग से हाहाकार मचा है...साथियों बात अगर हम बाढ़ और पानी जमा होने की करें और बड़े बुजुर्गों से पूछेंगे तो यह पहले भी बाढ़ आतीथी लेकिन वह इतने व्यापक कहर नहीं ढाती थी। इसके लिये गाँव वाले तैयार रहते थे।बल्कि इसका उन्हें इंतजार रहता था। 

खेतों को बाढ़ के साथ आई नई मिट्टी मिलती थी,भरपूर पानी लाती थी जिससे प्यासे खेत तर हो जाते थे। पीने के लिये पानी मिल जाता था, भूजल ऊपर आ जाता था, नदी नाले, ताल-तलैया भर जाते थे।समृद्धि आती थी। बाढ़ आती थी, मेहमान की तरह जल्दी ही चली जाती थी। लेकिन अब बहुत बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हो गई है। भूक्षरण ज्यादा हो रहा है। पानी को स्पंज की तरह अपने में समाने वाले जंगल खत्म हो गए हैं। जंगलों के कटान के बाद झाड़ियाँ और चारे जलावन के लिये काट ली जाती हैं। जंगल और पेड़ बारिश के पानी को रोकते हैं।

 वह पानी को बहुत देर तो नहीं थाम सकते लेकिन पानी के वेग को कम करते हैं। स्पीड ब्रेकर का काम करते हैं। लेकिन पेड़ नहीं रहेंगे तो बहुत गति से पानी नदियों में आएगा और बर्बादी करेगा और यही हो रहा है।पहले नदियों के आस-पास पड़ती जमीन होती थी नदी-नाले होते थे, लम्बे-लम्बे चारागाह होते थे, उनमें पानी थम जाता था। बड़ी नदियों का ज्यादा पानी छोटे-नदी नालों में भर जाता था। लेकिन अब उस जगह पर भी या तो खेती होने लगी है या अतिक्रमण हो गया है। लेकिन बाढ़ के कारण और भी हैं। 

जैसे बड़े पैमाने पर रेत खनन। रेत पानी को स्पंज की तरह जज्ब करके रखती है। रेत और प्राकृतिक संसाधन खनन किए जा रहा है। रेत ही नहीं रहेगी तो पानी कैसे रुकेगा, नदी कैसे बहेगी, कैसे बचेगी। अगर रेत रहेगी तो नदी रहेगी। लेकिन जैसे ही बारिश ज्यादा होती है, वेग से पानी बहता है ,उसे ठहरने की कोई जगह नहीं रहती। बढ़ता शहरीकरण और विकास कार्य भी इस समस्या को बढ़ा रहे हैं। बहुमंजिला इमारतें, सड़कों राजमार्गों का जाल बन गया है। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह अवरुद्ध हो गए हैं। 

जहाँ पानी निकलने का रास्ता नहीं रहता है, वहाँ दलदलीकरण की समस्या हो जाती है। इससे न केवल फसलों को नुकसान होता है बल्कि बीमारियाँ भी फैलती हैं। जो तटबंध बने हैं वे टूट-फूट जाते हैं जिससे लोगों को बाढ़ से बाहर निकलने का समय भी नहीं मिलता। इससे जान-माल की हानि होती है।शहरों में तो यह समस्या बड़ी है। पानी निकलने का रास्ता ही नहीं है। 

सभ जगह पक्के कांक्रीट के मकान और सड़कें हैं। जैसे कुछ साल पहले मुंबई की बाढ़ का किस्सा सामने आया था। वहाँ मीठी नदी ही गायब हो गई और जब पानी आया तो शहर जलमग्न हो गया। ऐसी हालत ज्यादातर शहरों की हो जाती है। अतः उपरोक्त पूरे विवरण का अगर हम अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम देखेंगे कि कोरोना में कुदरत की आपदा आई है। हर साल की वही कहानी क्यों?? रुकता है बारिश का पानी, इसका मुख्य कारण है पर्यावरण को मानव द्वारा नुकसान बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों का खनन, रणनीतिक नगर नियोजन सरचना में खामी और इसके लिए माननीय खता जिम्मेदार है।

-संकलनकर्ता-कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र