कैसे एक हो सकती हैं

कैसे एक हो सकती हैं

तुम्हारी व मेरी सफलता

छूते हैं जब दोनों

मंजिल का शिखर

तो एक कहाँ होती हैं,

तुम्हारी व मेरी परीक्षा।

नहीं सहते तुम

हर माह का दर्द

वो पेट की ऐंठन

पिण्डलियों की जकड़न

बुखार सा थका शरीर

कमजोरी से टूटता बदन,

मैं यह सब सहकर

चूमती हूँ अपनी

मंजिल का शिखर।

फिर एक कैसे हो सकता हैं?

तुम्हारी व मेरी सफलता का शिखर।


कितनी सरलता से तुम

पितृत्व सुख को पाते हो।

ना नौं माह का दुःख

ना कोई तकलीफ पाते हो।

मैं मौत से जंग जीतकर

मातृत्व सुख को पाती हूँ।

फिर एक कैसे हो सकता हैं?

तेरे मेरे सुख का सफर।


छू लूँ चाहें एवरेस्ट शिखर

या पार करूँ इंग्लिश चैनल

खेल का मैदान हो या

कुश्ती का हो दंगल

लड़ती हूँ हर रोज मैं

पहले अपने आप से

परिवार से, समाज से।

नजर अंदाज करती हूँ

मुझ पर कसे जाने वाले ताने।

वस्त्रों से लेकर चरित्र तक,

के लांछन सुनती हूँ।

चीर दे मेरे हृदय को,

ऐसे बाण सहती हूँ

तुम उन्मुक्त, स्वछंद हो

प्रकृति और समाज से।

फिर एक कैसे हो सकते हैं..?

तेरी मेरी उन्नति के रास्तें।


तुम आधी रात को निकलो

तो बुद्ध बना दिये जाते हो।

रास रचाओं गोपियों संग

कृष्ण बन पूजे जाते हो।

तुम दाँव पर भी लगा दो

अपनी दारा को

फिर भी धर्म राज कहाते हो।

हर ले जाएं कोई

छल से भी मुझे

लक्ष्मण रेखा पार करने का दोष

मुझी पर लगाते हो।

दया, ममता, करुणा, सहनशीलता

मेरे इन गुणों को तुम फर्ज बताते हो।

अपने पुरुषत्व की आड़ में

मुझकों दबाते हो।

फिर एक कैसे.......?


कवयित्री:-गरिमा राकेश गौत्तम

पता:-कोटा राजस्थान