“फिर उठेंगे “

वक्त ने ठोकर दी तो क्या फिर उठेंगे 

छीन ली मुस्कुराहट तो क्या फिर हँसेंगे 


क्यूँ उलझना बेकार की बातों में अब 

ख़्वाहिशों के जुगनु  आँखो में भरेंगे 


नहीं कटती कलांत मेरी  रात कोई 

भोर की रश्मियाँ साँसो में अनगिनत भेरेंगे 


भटक कर क्यूँ बिखरूँ मरु भूमि 

रेत में हर एक  कन बूँद  पानी  भरेंगे 


क्यूँ घुटन की वेदना के राग सींचूँ

संभल अहर्निश उजालो के पथ चुनुंगी 


क्यूँ रुकूँ और क्यूँ में तड़पूँ 

विरह के ना गीत सृजन मैं करूँगी 


सागर शोर छुपाए शांत बैठा 

रत्नों के एक वाटिका हरी करूँगी 


छत पर बिखरी सूर्य कणिका 

मोती आँचल में यही सुनहरे टकूँगी


जीवन यूँ ही निर्थक जिये जाना 

पल ना कोई भी ज़ाया करूँगी 


बिखरी पीयूष सम्पदा समर अंचल

मलय गंध चेतना हस हस भरूँगी 


सवि शर्मा 

देहरादून