चाय

जब मैं उठूँ तो याद सताए

पल पल निकलना मुश्किल हाय

मन को कितना भी मैं समझाऊं

पर इसके बिन चैन ना पाऊँ l


सुबह के बाद आए जब दोपहर

फिर है याद मचाती कहर

कितना सोचूँ कि गर्मी है

पर ये मुझे टिकने ना देती है

आफत ही मचा देती है l


जब कोई आ जाए रिश्तेदार

तो खूब नचाती मुझको यार

कितना भी हो बड़ा परिवार

सब इसके आगे मानते हैं हार l


ये मेरी आदत बनी है पक्की

डलती है पानी में,चीनी, दूध और पत्ती

फिर बन गैस पे हो जाए तैयार

क्या सोच रहे हो तुम दिलदार

लो अब चाय बिल्कुल तैयार l


यही है  बन गई एक पहेली

ये मेरी है पक्की सहेली

सुबह पी इसको हो जाऊँ तैयार

फिर संभालूँ मैं अपना घर - बार

क्योंकि चाय से है मुझे प्यार l


करमजीत कौर,शहर-मलोट

 जिला श्री मुक्तसर साहिब, पंजाब