भारतीय लोकतंत्र पर काला धब्बा था आपातकाल

“स्वाभाविक तौर पर तनाशाही का जन्म लोकतंत्र से ही होता है, और निरंकुशता व गुलामी का सबसे चरम रूप सबसे स्वच्छंद आजादी से जन्म लेता है।” –प्लेटो। 

भारतीय लोकतंत्र में अबतक का सबसे काला धब्बा इंदिरा सरकार द्वारा लगाया गया आपातकाल था , जिसने भारतीय लोकतंत्र को घायल कर दिया था और ऐसे प्रतीत हो रहा था मानो लोकतंत्र मृत्य  शैया पर सो रहा हो। सचमुच अब तक आजाद भारत ने कभी लोकतंत्र पर इतना बड़ा घाव नही देखा था। भारत के इतिहास में 25 जून का दिन एक काले दिन के तौर पर याद किया जाता है। आज ही के दिन 1975 में देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की गई जिसने कई ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म दिया। 25 जून 1975  से 21 मार्च 1977 तक की 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल रहा। 


आपातकाल की बू इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से ही आना शुरू हो गई थी। इसके बाद  इंदिरा गांधी की अपील को सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार करवाया गया ताकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनके रायबरेली संसदीय क्षेत्र से चुनाव रद्द किए जाने के फैसले को उलट दिया जाए। साफ  है कि आपातकाल की घोषणा केवल निजी फायदों और सत्ता बचाने के लिए की गई थी। इसीलिए श्रीमती गांधी ने जब राष्ट्रपति से आपातकाल की घोषणा करने का अनुरोध किया तो उन्होंने अपने मंत्रिमंडल तक की सलाह नहीं ली। आपातकाल लगाने के जिन कारणों को इंदिरा गांधी सरकार ने अपने ‘श्वेतपत्र’ में बताया, वे नितांत अप्रासंगिक हैं।  कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले ने एक साल से आंदोलनरत विपक्ष को वह ‘ऑक्सीजन’ दे दी थी जिसे उसे तलाश थी. इसी फैसले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देश में आपातकाल लगाने पर मजबूर कर दिया था ।जिस मुकदमे में यह फैसला आया था उसे ‘राजनारायण बनाम उत्तर प्रदेश’ नाम से जाना जाता है। इस मुकदमे में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनावों में धांधली का दोषी पाया था. 12 जून 1975 को सख्त जज माने जाने वाले जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने अपने निर्णय में उनके रायबरेली से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध करार दे दिया. अदालत ने साथ ही अगले छह साल तक उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी. ऐसी स्थिति में इंदिरा गांधी के पास राज्यसभा में जाने का रास्ता भी नहीं बचा. अब उनके पास प्रधानमंत्री पद छोड़ने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. कई जानकार मानते हैं कि 25 जून, 1975 की आधी रात से आपातकाल लागू होने की जड़ में यही फैसला था। 


23 जून को इंदिरा गांधी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए दरख्वास्त की कि हाईकोर्ट के फैसले पर पूर्णत: रोक लगाई जाए ।अगले दिन सुप्रीम कोर्ट की ग्रीष्मकालीन अवकाश पीठ के जज जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर ने अपने फैसले में कहा कि वे इस फैसले पर पूर्ण रोक नहीं लगाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति तो दे दी, लेकिन कहा कि वे अंतिम फैसला आने तक सांसद के रूप में मतदान नहीं कर सकतीं। कोर्ट ने बतौर सांसद इंदिरा गांधी के वेतन और भत्ते लेने पर भी रोक बरकरार रखी। यही वह समय भी था जब गुजरात और बिहार में छात्रों के आंदोलन के बाद देश का विपक्ष कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो चुका था। लोकनायक कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण यानी जेपी पूरे विपक्ष की अगुआई कर रहे थे। 


जेपी के एक ब्यान को इंदिरा ने देश के लिए खतरा माना और आपातकाल में झोंक दी। वास्तव में कोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी की स्थिति नाजुक हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही उन्हें पद पर बने रहने की इजाजत दे दी थी, लेकिन समूचा विपक्ष सड़कों पर उतर चुका था।  इंदिरा गांधी किसी भी तरह सत्ता में बने रहना चाहती थीं और उन्हें अपनी पार्टी में किसी पर भरोसा नहीं था ऐसे हालात में उन्होंने आपातकाल लागू करने का फैसला ​किया। इसके लिए उन्होंने जयप्रकाश नारायण के बयान का बहाना लिया। 26 जून, 1975 की सुबह राष्ट्र के नाम अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा, ‘आपातकाल जरूरी हो गया था। एक ‘जना’ सेना को विद्रोह के लिए भड़का रहा है. इसलिए देश की एकता और अखंडता के लिए यह फैसला जरूरी हो गया था। 


आपातकाल की कालिख लगने के साथ ही नागरिकों का मौलिक अधिकार खत्म हो गया। अनगिनत प्रमुख विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर पिजड़े में डाल दिया गया। जेपी की लोकप्रियता को देखते हुए सरकार की हिम्मत नही थी कि दिन के उजालों में गिरफ्तार किया जाए तो ऐसे में अंधेरी रात में भारतीय लोकतंत्र पर कालिख पोतने का काम किया गया। जेपी गिरफ्तार हुए और आपातकाल के लिए घोषणा कर दी गई। प्रेस को सेंसरिंग कर दिया गया। इसके विरोध में तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री ने इज्जत देने से बेहतर इस्तिफा देना बेहतर लगा। इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने संविधान के अधिकारों का गलत उपयोग करते हुए परिवार नियोजन के नाम पर जबरन नसबंदी अभियान चलाया।आपातकाल के दौरान अप्रैल, 1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने दिल्ली के तुर्कमान गेट पर बसी झोपड़ियों को गिराने का आदेश दिया। जब लोगों ने विरोध किया तो पुलिस ने गोलियां चलाईं जिसमें कई लोगों की जान गई। ऐसे अनगिनत अपराध हुए जो लोकतंत्र पर काला धब्बा बन गया। 


इंदिरा गांधी को सबसे पहले राजनारायण के मुकदमे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम फैसले का निबटारा करना था। इसलिए इन फैसलों को पलटने वाला कानून लाया गया. साथ ही इसका अमल पूर्व काल से लागू कर दिया। संविधान को संशोधित करके कोशिश की गई कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष पर जीवन भर किसी अपराध को लेकर कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इस संशोधन को राज्यसभा ने पारित भी कर दिया लेकिन इसे लोकसभा में पेश नहीं किया गया  । सबसे कठोर संविधान का 42वां संशोधन था। इसके जरिए संविधान के मूल ढांचे को कमजोर करने, उसकी संघीय विशेषताओं को नुकसान पहुंचाने और सरकार के तीनों अंगों के संतुलन को बिगाड़ने का प्रयास किया गया। 


वाल्टर क्रोंइकाइट ने कहा था कि “पत्रकारिता वह चीज है जो लोकतंत्र को चलाए रखने के लिए जरूरी है।” लेकिन इन प्रेस को भी नही बक्सा गया। प्रेस सेंसरिंग इस कदर बढ़ गई थी कि अख़बारों में क्या छपेगा क्या नहीं यह संपादक नहीं, सेंसर अधिकारी तय करते थे ।राज्यों के सूचना विभाग, भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) और जिला-प्रशासन के अधिकारियों को सेंसर-अधिकारी बनाकर अख़बारों पर निगरानी रखने का काम दिया गया था। ये अधिकारी संपादकों-पत्रकारों के लिए निर्देश जारी करते थे । खुद उन्हें ये निर्देश दिल्ली के उच्चाधिकारियों, कांग्रेस नेताओं, ख़ासकर इंदिरा गांधी और उनके छोटे बेटे संजय गांधी की चौकड़ी से प्राप्त होते थे।इन पर अमल करना अनिवार्य था अन्यथा गिरफ़्तारी से लेकर प्रेस-बंदी तक हो सकती थी। 


जेलों में पुलिस दमन के शिकार अक्सर वे कार्यकर्ता हुए जो सत्याग्रह का संचालन करते हुए प्रचार सामग्री तैयार करते और बांटते थे। पुलिस अत्याचारों की बहुत-सी मिसालें हैं. सत्या​ग्रहियों और भूमिगत कार्यकर्ताओं को उनके सहयोगियों के नाम जानने, उनके ठिकानों का पता लगाने, उनके कामकाज की जानकारी हासिल करने के उद्देश्य से बहुत तंग किया गया। रात को भी सोने न देना, खाना न देना, प्यासा रखना या बहुत भूखा रखने के बाद बहुत खाना खिलाकर किसी प्रकार आराम न करने देना, घंटों खड़ा रखना, डराना-धमकाना, हफ्तों-हफ्तों तक सवालों की बौछार करते रहना जैसी चीजें बहुत आम थीं। 


आपातकाल के दौरान, संविधान निलंबित कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने ही बस कॉर्पस के आधार पर जनता की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को भी खत्म कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब आपातकाल के समय  नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को खत्म करने के 40 साल बाद, नौ न्यायाधीशों की बेंच ने एडीएम जबलपुर मामले में इस निर्णय की निंदा की। इसे हिबस कॉर्पस मामले के रूप में जाना जाता है। उस बेंच ने आपातकाल के समय कोर्ट के उस निर्णय को एक 'गंभीर गलती' कहा। उस बेंच के पांच न्यायाधीशों में से सिर्फ न्यायमूर्ति एच आर खन्ना ने भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एएन रे और जस्टिस एमएच बेग, वाईवी चंद्रचुड़ और पीएन भगवती से अपनी असहमति‍ जाहिर की थी। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार, भारत के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर के नेतृत्व में नौ न्यायाधीशों की बेंच ने आधिकारिक तौर पर हिबस कॉर्पस मामले में सुप्रीम कोर्ट के बहुमत की राय की आलोचना की। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचुड़ ने फैसला लिखा। संयोग ये है कि डीवाई चंद्रचुड़ आपालकाल के समय नागरिकों के अधिकार को खत्म करने वाले न्यायमूर्ति वाईवी चंद्रचुड़ के बेटे हैं। डीवाई चंद्रचुड़ ने 1976 के फैसले को खारिज कर दिया। इस देश को सरकार ने पूरे देश को एक बड़े जेलखाना में बदल दिया गया था। आपातकाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। इमरजेंसी में जीने तक का हक छीन लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भी 2011 में अपनी गलती मानी थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2 जनवरी, 2011 को यह स्वीकार किया कि देश में आपातकाल के दौरान इस कोर्ट से भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ था। 


इमरजेंसी के दौरान सरकार ने जीवन के हर क्षेत्र में आतंक का माहौल पैदा कर दिया था। इन सभी काले कारनामों के कारण जनता ने 1977 में एकजुट होकर न केवल कांग्रेस बल्कि इंदिरा गांधी को भी धूल चटा दी। इस तरह जनता ने लोकतंत्र में अपनी आस्था का सबूत दे दिया। आज इमरजेंसी को भुलाने की कोशिश की जाती है लेकिन हमें उन काले दिनों के अनुभवों को नहीं भूलना नहीं चाहिए।  उन अनुभवों से ही हम वे सबक सीखते हैं जिनसे हमारा लोकतंत्र और मजबूत बनेगा।


देश बार बार उस आपातकाल से मिलने वाले सबक को याद करता रहेगा। ख़ास कर, युवाओं को आज़ाद भारत के उस काले अध्याय की जानकारी और उससे मिले सबक को जानना होगा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, "जब भी मैं निराशा होता हूं, तब इतिहास के पन्नों को पलटकर सत्य और प्रेम की जीत को दोहराने वाले तथ्यों का स्मरण करता हूं । इतिहास के पन्नों पर आतातायी और हत्यारे भी रहे हैं और कुछ पल के लिए वो अजेय भी दिखे लेकिन यह ख़ास ख़्याल रखें कि अंत में उनका खात्मा हुआ है। जीत हमेशा सत्य की हुई है। " हमें अपने कटु अनुभवों से सीख लेने की आवश्यकता है, ताकि न्यू इंडिया के सपने को साकार कर सकें।


               ---   नृपेन्द्र अभिषेक नृप