न लगाएं किसी से आस

एक इंसान के लहजे में

किसी दूसरे इंसान के प्रति विनम्रता,

आंखों में याचना

और वाणी में अत्यधिक मिठास

रहती है आजकल ज्यादातर तब तक ही

जब तक हो उससे 

किसी प्रकार के फायदे की आस,


और तो और करीबी रिश्तों में भी

मन ही मन लगाया जाने लगा है

साथ रहने के 

फायदे और नुक्सान का 

पूरा हिसाब-किताब,

वक्त आने पर अपने ही काम आएंगे

डगमगाने लगा है अब ऐसा विश्वास,


जिन लोगों के लिए किया सब कुछ

वो भी कम ही करते हैं

कृतज्ञता प्रकट करने का प्रयास,

हमनें तो कहा नहीं था ऐसा कुछ

करने को

दिलाना चाहते हों मानो ऐसा अहसास,


समय आया है अब ऐसा कि

भाई-बहनों से तो नहीं ही लेकिन अपने

बच्चों से भी करे न इंसान कोई आस,

अपनी धन-संपत्ति को सबके लिए

कर ही न डालें एकदम खल्लास

वरना जरूरत पड़ने पर 

होना पड़ सकता है इंसान को बेहद निराश।


जितेन्द्र 'कबीर'

संपर्क सूत्र - 7018558314