और आजकल क्या चल रहा है...

कल हमने किसी से पूछ लिया – भई! और आजकल क्या चल रहा है?

भाई साहब ऐसे जवाब देने लगे कि मानो मेरे इसी सवाल के लिए कई दिनों से टकटकी लगाए बैठे थे। उन्होंने कहा – आजकल गंगा नदी में नाव की जगह लाशों का रेला चल रहा है। अस्पतालों में ‘तू मर-मैं आया’ का खेला चल रहा है। शराब की दुकानों से सुख और अस्पतालों से दुख खरीदने का धंधा चल रहा है। कोरोना से कम समाचार चैनलों से ज्यादा डराने का खिलवाड़ चल रहा है। चेहरे पर मास्क और घुटती सांसों का ब्रेकडांस चल रहा है। लॉकडाउन के नाम पर घरों को अघोषित कारागार बनाने का काम चल रहा है। कहीं गलाफाड़ने तो कहीं छाती पीटने का संगीत चल रहा है। पेड़ों को काटकर सिलेंडर में हवा भरने का तमाशा चल रहा है। कहीं करोना को किरौना तो कहीं उसे हमारी तरह प्राणी बताकर ‘उसे भी जीने दो’ का नारा चल रहा है। शरीर में कम आंकड़ों में ज्यादा वैक्सिन लगाने का कांपिटीशन चल रहा है। कुंभ में डुबकी लगाकर पाप धोने का कहकहा चल रहा है। ऑफलाइन की दुनिया में ऑनलाइन का धमाका चल रहा है। बच्चों पर स्मार्ट होने के नाम पर किताबों से दूर करने वाले ऑनलाइन गेमों का जादू चल रहा है। विपक्ष सरकार के बाल तो सरकार विपक्ष की खाल नोचने की चाल चल रहा है। लॉकडाउन के चलते भुखमरों, बेरोजगारों का शहर छोड़ने तो अमीरों का नए-नए व्यंजन बनाकर यूट्यूब पर लाइक्स के लिए गिड़गिड़ाने का नाटक चल रहा है। कुल मिलाकर देश कछुए की चाल चल रहा है।

‘भई मुझे माफ़ करो! मुझे बख्श दो! लगता है मेरा समय खराब चल रहा है।‘ इतना कहते हुए मैं वहाँ से नौ-दो ग्यारह हो गया।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657