दो टूक- वह कागज में नाम बड़े हैं

दरपन जिन्हें नहीं भाता था, 

वे दरपन के साथ खड़े हैं।

गजब हुआ जो दीवाने थे,

वह दरपन से आज डरे हैं।


कल जिस रस्ते से आए थे,

वह इन ऊंची मीनारों तक,

अब उसको ही खतरा कहकर,

बन्द करन के लिए अड़े हैं।


शर्म आ रही है कहने में,

लेकिन वह अक्सर कहते हैं,

उनके दागी देश विरोधी,

अपने दागी साफ धुले हैं।


हैं अपराधी सांप सरीखे,

जो कहते हैं बच के रहना,

हमने देखा है उनको भी,

खुद पाकिट में सांप धरे हैं।


भात दाल के चूल्हे ठंडे, 

चाय दुकानें बंद जहां हैं,

हैरत है की उसी शहर में, 

पीने खातिर बार खुले हैं।


सच्चाई हमसे मत पूछो,

आदमखोर बड़ी मंडी में,

हमें मिले जो मौत बेचते,

वह कागज में नाम बड़े हैं।


सिर्फ नशा है जिसके भीतर,

वह तरकुल है तना गगन में,

झुकी हुई है वह जमीन पर,

जिसमें मीठे आम फले हैं।


धीरु भाई