संन्यास की ओर

क्षणभंगुर जीवन में वासनाओं का वास है

'ये तेरा,ये मेरा' इससे अच्छा तो संन्यास है 

चाहे कितना ही बांधे मुट्ठी में रिश्तों को 

एक  दिन मिट्टी की तरह फिसलन पास है

भोला है तू प्राणी रिश्तों में सुख ढूंढ रहा है

मृगतृष्णा  में  तेरा  गला आज सुख रहा है

कौन किसका है यहाँ पर उलझन बड़ी है

महज़ दिखावे के आगे तेरी दुनियाँ खड़ी है

जो तू कहता है कि ये मैं ही कर सकता हूं 

झाँक  इतिहासी शब्द मैं ही कर सकता हूं 

ये शब्द आज भी धरा का धरा रह ही गया 

अहम् शब्द कहने वाला आज बह ही गया 

पुण्य के कार्य में भी अहम भाव भर आया 

मंच बड़ा था नाम अपना बुलवा कर आया 

बड़े  दुःखी  मन से  देख  रहा लाश की ओर 

अब छोड़ दुनियाँ और चल संन्यास की ओर 


कवि दशरथ प्रजापत 

पथमेड़ा, जालोर (राजस्थान) 

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