दहेज एक अभिशाप

यह दहेज प्रथा जग की,

भयंकर सी बीमारी है।

सभी को वश में करती है,

कुटिल सी यह शिकारी है।

बिटिया के बाप की खुशियां,

यहाँ कर्जे में दबती जाती हैं।

दहेज की मांग जो करते हैं,

असल में वे सब भिखारी है।

किसी के दिल के टुकड़े को,

नहीं दौलत से तुम तोलो।

किसी के दरवाजे जाकर,

दर्प की बात मत घोलो।

ये मत भूलो कभी भी तुम,

बनोगे बाप बिटिया के।

दहेज रूपी जहर को अब,

नहीं समाज में तुम घोलो।।

दहेज ना जानें अब तक कितने,

 मासूमों के जीवन को लील गया।

इस दहेज के चक्कर मे अब तो,

जग से दया धर्म और शील गया।

अभिशाप बना है दहेज आजकल,

आओ मिलकर इसको अब रोकें।

अगर किसी से कोई मांगे दहेज,

तो सब मिलकर उनको टोंके।।


अशोक प्रियदर्शी,स0अ0

प्रा0 वि0 रामपुर कल्याणगढ़

मानिकपुर,चित्रकूट, उत्तर प्रदेश

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