दाल गलाने के नए-नए तरीके

साहब आपसे मिलने के लिए कोई बड़ा आदमी आया है। सफेद कमीज, सफेद पायजामा, हाथ और गले में एकदम भैंस की सिकड़ी जैसा सोना लादे, पैरों पर पैर धरे बड़ा हेकड़ी हांक रहे हैं। वे आपसे मिलना चाहते हैं। कहूँ तो भीतर बुलाऊँ? - नौकर ने भजनखबरी से कहा। भजनखबरी ने विज्ञापनों से भरे समाचार पत्र में इलाके के समाचार ढूँढ़ते हुए कहने लगा – ओह! इसका मतलब नेता जी आए हैं। एक बार के लिए बिना पूजा के भगवान दर्शन दे सकते हैं, लेकिन बिना मतलब के नेता कतई नहीं। लगता है आज उनके मतलब का पड़ाव मैं हूँ। ठीक है आने दो।

नौकर नेताजी को बुला लाता है। चाय-पानी के बाद नेताजी भजनखबरी से कहते हैं -  मेरे आदमी आपसे कई बार आकर मिले। लेकिन आप हैं कि बड़ा भाव खा रहे हैं। श्राद्ध गुजर जाने पर कोई कौए को नहीं पूछता। मानता हूँ कि आपने इलाके में दो-चार अच्छे काम किए हैं, इसका मतलब यह नहीं कि आप हमारा प्रस्ताव ही ठुकरा दो। भगवान क्रोधित हो जाएँ तो एक बार के लिए फिर से मनाया जा सकता है। लेकिन ऐसी गारंटी नेता नहीं दे सकता। लगता है आपके दिमाग को जंग लग गया है। कभी-कभी समझदारी का तेल डाल लिया करें। जंग लगा दिमाग और सड़ा हुआ फल न किसी के काम आया है और न आएगा। इसलिए मेरा कहा मानिए उस दस एकड़ की जमीन में आप अपने पिता की तीस फुट की मूर्ति बनाने की अनुमति दे दीजिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यह काम सरकारी पैसे से पूरा होगा। आप मेरी पीठ की खुजली मिटाइए। मैं आपकी पीठ खुजा देता हूँ।   

भजनखबरी ने नेता जी की आँखों में देखते हुए कहा - पहली बात तो आप जिसे दस एकड़ की जमीन कह रहे हैं, वह दस नहीं तीस एकड़ है। हर बीस गज में एक झोपड़ी बनाकर दस हजार परिवार वहाँ रह रहे हैं। करोड़ो रुपयों की जमीन पर एक मूर्ति लगाकर जमीन हड़पने की जो योजना है न उसे आप अपने पास ही रखिए। जनता के बारे में आप नहीं जानते। दिखने में तो वे भोले-भाले होते हैं। जब तक विश्वास दिलाओ तब तक आपका कहा मानते हैं। एक बार उनके भरोसे की ऐसी-तैसी करके देखिए। वे आपको न पाताल में गड़ने देंगे और चिता पर लेटने। वैसे भी जनता का नेता दिलों में बसता है, न कि बेजान मूर्तियों में। जो दिल में बस गया समझो उसका जीवन धन्य हो गया। निर्जीव वस्तुओं में सजीवता नहीं बसती। सजीवता तो सजीवों में बसती है। इसलिए जीते जागते भगवानों को छोड़, उनका बसेरा तोड़ मूर्ति बना भी लोगे तो वह प्यार नहीं मिलेगा जिसके वे हकदार हैं। मूर्तियों के बहाने सजीवों के पेट पर लात मारकर अपना स्वार्थ साधने वाले कुछ भी कहलायें लेकिन इंसान हरगिज़ नहीं कहला सकते। इस तरह की कमाई बदन बेचकर कमाने वालों से भी बदतर है। वैसे मुझे यह बताइए कि आप मूर्ति बनाकर कौनसा अमूर्त मतलब साधना चाहते हैं?

नेता जी ने कहा – जैसा कि आप जानते हैं कि पिछले कई चुनावों से यहाँ आलाकमान की दाल नहीं गल रही हैं। अगर आप साथ हो जाएँ तो यहाँ पर कई सारे प्रोजेक्ट पूरे हो सकते हैं। इसमें आपको भी ढेर सारा फायदा होगा। वह क्या है न कि पार्टी आलाकमान आपके पिता की मूर्ति स्थापित कर आपको अपनी पार्टी में जोड़ना चाहती है।

भजनखबरी ने दो टूक जवाब देते हुए कहा – जनता की सेवा करने के लिए पद की आवश्यकता नहीं पड़ती। हाँ लूटने के लिए इसकी आवश्यकता पड़ती है। मेरे लिए पद कोई तमगा नहीं है, जिसे सीने पर लगाए इधर-उधर तमाशा करूँगा। पद कुत्ते के सामने फेंका हुआ टुकड़ा नहीं है कि जो चाहा, जिसे चाहा, जैसे चाहा दे दिया। पद देना या न देना जनता का काम है। जनता का दिया हुआ पद सबसे बड़ा सम्मान होता है। जनता के वोटों से जीतकर उनकी उम्मीदों का गला घोटने वाला नेता नहीं हत्यारा कहलाता है।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657