जीवन मेला है

यह जीवन सुंदर मेला है ,

फिर भी इंसान अकेला है ।

बिखरी हैं खुशियांँ यहां-वहांँ ,

नादान का खाली ठेला है।

इसमें हंँसकर वो हीए चलता,

जिसने हर गम को झेला है।

धीरज साहस है जिस नर में 

दु:ख उसने दूर धकेला है।

तू खूब कमा धन जीवन में,

जीवन पैसे का मेला है ।

सब तुझको शीश झुकायेंगे ,

गर ज़ेब मैं तेरी धेला है।

यह जीवन कठिन परीक्षा है,

नित नव प्रयास की बेला है।

पहचान बना ले खुद जग में,

जब चलता सा इक रेला है।

इक आता है ,इक जाता है,

सब चला चली का खेला है।

इक दिन मिट्टी में मिलना है,

मानव मिट्टी का ढेला है।


वीनू शर्मा,जयपुर-राजस्थान