धरती के देव हैं सुकेत के धार गांव में विराजित महीदेव

मण्डी जिले की सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि सैंधव व वैदिक कालीन रही है। पुरात्तात्विक व साहित्यिक स्रोतों के आधार पर यह निष्कर्ष रूप में सामने आया है कि माण्डव (मण्डी) व सुकुट (सुकेत) क्षेत्र में मानव सभ्यता के उषाकाल में सांस्कृतिक व सामाजिक व्यवस्था प्रचलित थी। सैंधवकाल में धरती पूजा का आविर्भाव व प्रचलन पुरातात्विक खोजों से प्रमाणित हो चुका है। हिमाचल में अच्छी फसल व तत्सम्बंधी बीमारियों के निवारण के लिये भूमि देव खेत्रपाल, खोड़ू व वन देवी की पूजा की जाती है। सायर का पर्व विशुद्ध रूप में प्रकृति देवी व प्रकृति की संचालन शक्तियों के लिये समर्पित है। नदी, पर्वत, उच्चस्थ शैल शिखर वृक्ष, गुल्म, जलस्रोत व जलाशय देव हिमाचल में शक्ति के प्रतीक रूप में पूजित हैं। करसोग उपमण्डल के पश्चिम में धार गांव में मही देव का पहाड़ी शैली का मंदिर व धार में  महीदेव की कोठी आस्था का केन्द्र है। मही देव का मंदिर धार गांव के देओठी में एक लघु पहाड़ी पर बना है। मंदिर की स्थिति को देखकर लगता है कि यहां कभी गढ़ रहा होगा।पहाड़ी टेकड़ी पर लगभग समतल भूमि पर अवस्थित महीदेव का यह मंदिर ऐसे गढ़ के मध्य स्थित है, जो समीप से भी दृष्टिगोचर नहीं होता। गढ़ की ऐसी स्थिति गढ़ निर्माण के सामरिक कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है। महीदेव मंदिर के गर्भ क्षेत्र में शिवलिंग प्रतिष्ठित है, इससे महीदेव के शैव मत से संबद्धता की पुष्टि होती है। हिमाचल के संदर्भ में यह सर्वविदित है कि शिव का महादेव रूप सर्वव्यापक है। यहां के देव समुदाय का मौलिक विग्रह प्रस्तर पिण्ड हर मंदिर में स्थित है। यहां ब्रह्मा, विष्णु, देवता, ऋषि, नाग व देवत्व को प्राप्त किसी व्यक्ति का प्रारम्भिक स्वरूप लिंग रूप में ही प्रतिष्ठित है।


वास्तव में हिमाचल के महादेव प्रागैतिहासक व वैदिक देव होने के कारण नाग, वैष्णव व जड़ात्मवाद से भी अभिन्न रूप में जुड़े हैं। विष्णु से शिव की अविच्छिन्नता के कारण हिमाचल में शैव व वैष्णव मत की अभिन्नता के कारण मतावलम्बियों में भी पारस्परिक प्रभेद नहीं है। यही कारण है कि यहां के धर्मावलम्बियों में भिन्न-भिन्न मतों को लेकर कोई विवाद नहीं है। हिमाचल का लोक बहुदेववादी है और सभी जीवजगत में एक ही तत्व की सत्ता के सिद्धात के पोषक रहे हैं।

पलीउणी निवासी कुठियाला जगतराम ठाकुर जी(82वर्षीय) का कहना है कि महीदेव की उत्पत्ति खेत में हुई।आज भी इस खेत में  हल नहीं जोता जाता।महीदेव के रथ का जब भी श्रृंगार होता है तो देवरथ कोठी से निकलकर सबसे पहले इस खेत के खलिहान में  विराजते हैं।महीदेव के धार गांव में प्राकट्य के विषय में रमेश शास्त्री जी कहते है कि यह मान्यता प्रचलित है कि महीदेव ब्राह्मण परिवार से सम्बंधित हैं, जो परिवार सहित महीसागर संगम के नामक गुप्त स्थान से धार गांव आये थे। मही सागर के सम्बंध में स्थिति स्पष्ट नही है। महीसागर संगम कोई तीर्थस्थल है, जो प्रयाग जैसे पवित्र स्थल से सम्बंधित है। महीसागर का सम्बंध क्षीरसागर से भी अभिप्रेत हो सकता है। चूंकि मही का एक अर्थ मट्ठा अर्थात् दही भी है। निश्चित रूप से यह ब्राह्मण परिवार किसी पवित्र स्थल से यहां आया होगा। मान्यता के अनुसार इस ब्राह्मण परिवार में दो भाई और एक बहन थी, जो अपनी शूरवीरता के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार समीपस्थ काण्ढा गांव में मुसलमानों का "धावा" (आक्रमण) हुआ था। मुसलमान धावा बोल कर लूटपाट किया करते थे। मुसलमानों के उत्पात से पूरे क्षेत्र में त्राहि-त्राहि मच गई थी। त्रस्त जनता ने तीनों वीर भाई-बहन से आततायियों से रक्षा की प्रार्थना की थी। तीनों ने जाकर मुस्लमानों का डटकर मुकाबला किया।मुस्लमानों का सरदार मारा गया तथा बाकी आक्रमणकर्ताओ को भागने के लिये बाध्य कर दिया था। इस संघर्ष में एक आततायी "बेडे" ने काण्ढा और धार गांव के रास्ते में पड़ने वाले पहाड़ी नाले में देवदार के कैन्थ(कश्टियों)से भरे किल्टे पीछे छिपकर धोखे से वार किया।अग्रज ने इस बेड़े को भी मार गिराया। बेड़े के वार से अग्रज को काफी चोटें आईं थी और वह घायल हो गया था। उसने लोगों से कहा कि जहां मेरा प्राणांत हो, वहां कोई बस्ती न बसे और वहां केवल प्रस्तर का ढेर(शूरल) ही प्रतीक रूप में रहे। इस वीर भाई ने धारेबाग नामक स्थान पर प्राण त्यागे थे।मृत्यु से पूर्व अग्रज ने कहा कि उसकी अंत्येष्टि उस स्थान पर हो, जहां से महामाया पांगणा का दुर्ग मंदिर दृष्टिगोचर हो। पुन: जब मेरा आविर्भाव हो तो उस स्थान से पांगणा सरिता के किनारे फेगल में मेरी बहन का मंदिर  दृष्टिगोचर हो। ब्राह्मण की इस अंतिम उद्घोषणा के अनुसार उस स्थान पर अंत्येष्टि की गई, जहां से महामया पांगणा का मंदिर स्पष्ट दिखता है। इस घटना से यह अनुमान लगाना सहज है कि सेन वंश के आदि पुरूष वीरसेन ने पांगणा में राजधानी स्थापित करने से पूर्व बेलरधार में अस्थाई राजधानी स्थापित की होगी और यहीं अपनी कुलदेवी कलकत्ता की काली रूपा महामाया को प्रतिष्ठित किया होगा।चूंकि बेलरधार की भौगोलिक स्थित सामरिक दृष्टि से अनुकूल हैं। यहां से सुकेत के अधिकत्तर क्षेत्र को एक दृष्टि से देखा जा सकता है। यहां कुछ समय तक रूकने के बाद अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर वीरसेन ने पांगणा की ओर प्रस्थान किया होगा। सम्भवत: महीदेव ने महामाया की शक्ति से ही मुसलमानों पर विजय पायी और स्वयम् की अंत्येष्टि के समय महामाया के मंदिर के दर्शन पाकर देवत्व प्राप्त किया था।

मही देव भूमि, फसल, पशुधन व महामारी हरण के सशक्त देव हैं। कहते हैं कि पूर्व में महामारी के प्रकोप को रोकने के लिये देवता के मंदिर पर महामारी शमन अनुष्ठान होते रहे हैं.। वास्तव में मही का शाब्दिक अर्थ पर्वत, धरणी या सृष्टि को धारण करने वाली शक्ति से है। महीदेव का सम्बंध इस आधार पर भूमिदेव से अधिक घनिष्ठ प्रतीत होता है। धरणी देव होने के कारण सृष्टि के आधार सदाशिव के अंशावतार होने के कारण लिंग रूप में उनका पार्थिव विग्रह गर्भगृह में स्वत: प्रादूर्भूत है। मंदिर के बायीं ओर महीदेव के अनुचर देव श्मशान वासी "मशाणू" और "बैहणी भंदुक" के प्रस्तर व काष्ठ विग्रह (मुंढलियां) स्थापित है।महीदेव के साथ काली माता, किरणा कोटिया "बाँढ" (घटोत्कच),दानुवीर,हीरा महता,रक्सेटा अन्य अधीनस्थ बाण देव सेवा के लिये प्रस्तुत है। मंदिर में सूर्य भगवान की इन्डो-इरानी शैली की त्रिमुखी सूर्य मूर्ति  स्थापित है। सूर्य नारायण की ठोडी पर दाड़ी है, जो इरानी प्रभाव को इंगित करती है।धार निवासी जेठूराम का कहना है कि महीदेव रावण के बेटे महिरावण हैं।जिन्हें भगवान राम ने देवत्व प्रदान किया था।महीदेव पहले चुराग क्षेत्र के आराध्य देव नाग सुनानी  के साथ भी रहते थे।   

महीदेव धार बेलर में प्रतिष्ठित मानव से दैवीकरण का उच्चस्थ उदाहरण है। महीदेव के अनुज पांगणा सरिता के किनारे मझांगण में देवरूप में प्रतिष्ठित हैं। महीदेव ने महाप्रयाण के समय यह भी निर्देश दिया कि उनका मंदिर वहां बने, जहां से पांगणा सरिता के दायीं ओर फेगल में उनकी बहन छिबरी माता का मंदिर दृष्टिगोचर हो। धार गांव के महीदेव का प्राकट्य मानव में दैवीय गुणों व सामर्थ्य का जीवंत उदाहरण हैं। महीदेव धरणी देव हैं, जो उत्पादकता के देव हैं। उनके वीरोचित कार्य से देवत्व की प्राप्ति उच्च आदर्शों की प्रति उनकी प्रतिबद्धता का परिचायक है। सुकेत में हिमाचल के अन्य भागों की तरह कतिपय पावन आत्माओं के दैवीकरण की प्रतिष्ठा प्रचलित है। सुकेत रियासत के संस्थापक वीरसेन अपने कुरू वंश के चक्कवर्ती राजा युधिष्ठिर के अंशावतार होकर बाड़ादेव रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की। महीदेव धार गांव, उनके अनुज मझांगण गांव और बहन फेगल गांव में दैविक शक्ति रूप में मान्य देव हैं। किंवदंती है कि महीदेव का देवरथ बड़योग से लाया गया है।इस देवरथ में स्थापित मोहरों के साथ गज रूप छड़ी में काली माता विराजमान है।इस गज रूप छड़ी को कभी भी देवरथ से अलग नहीं  किया जाता।इस गज से किरणा कोटिया पर  नियंत्रण रहता है।मान्यता है कि धार और आसपास के इलाकों में आज भी किरणाकोटिया बाघ रुप में नजर आते हैं।महीदेव के प्राचीन मंदिर के स्थान पर भूमि तल से लगभग 15 फुट ऊंचे स्थान पर प्राचीन शैली का नया मंदिर बना है।पहाड़ी शैली में बना यह देओरा(मंदिर) बहुत ही भव्य है।ज्येष्ठ महीने के 4 प्रविष्टे को महामारी के निवारण के उपलक्ष्य में धार टिक्कर में  मेले का आयोजन होता है।25 ज्येष्ठ को थुआ में बड़े मेला भरता है।इसमें महीदेव,देव धड़यास,कालिया नाग और नाग शलोटी के देवरथ शोभा बढ़ाते हैं।आषाढ़ महीने में बेलर में मेला भरता है। जेठूराम का कहना है कि बेलर निवासी हुकमचंद ने संतान के लिए महीदेव से मन्नत मांगी। आखिर हुकमचंद देव आशीर्वाद से पिता बन गए तो उन्होंने मेले का आयोजन कर अपना वचन निभाया।इन मेलों में ग्रामीण परिवेश की झलक देखने को मिलती है।मार्गशीर्ष मास की अमावस्या को धार में "बूढ़ी दीवाली"(मंघरैओड़ी)  का आयोजन होता है।बारह वर्षों के बाद महीदेव देव वाद्यों व देवलुओ के साथ अपनी "हार"(प्रजा क्षेत्र)दारल,पलीहुणी, खडूहण,मलाओ,धार-बेलर की शोभायात्रा पर निकलते हैं।इस दौरान हर गांव मे महीदेव व देवलुओ का रात-दिन स्वागत,पूजा-अर्चना,आदर सत्कार कर मन्नौतिया मांगी और अर्पित कर गांव वासी स्वंय को धन्य मानते हैं। देवता की व्यवस्था के लिए देव परंपरा के अनुसार देव समिति में नरसिंह दास कुठियाला,भेदसिंह,देवीसिंह,बिहारी लाल,दौलतराम मैहता,लीलाधर कटवाकर,जोगेन्द्र शर्मा पुजारी हैं।कृष्ण लाल प्रधान,परसराम उप-प्रधान,मोहन सचिव,लालसिंह कोषाध्यक्ष हैं।संस्कृति मर्मज्ञ डाक्टर जगदीश शर्मा,संस्कृति संरक्षक राज शर्मा, विज्ञान अध्यापक अमर चंद, स्नातक अध्यापक बुद्धि सिंह और रमेश शर्मा का कहना है कि नैसर्गिक सुषमा से सुशोभित यह दिव्य स्थल अति सुंदर,शांत और रमणीय है। महीदेव से अनेक अलौकिक घटनाएं जुड़ी हैं।  वस्तुत: वेद भूमि सुकेत में शिव, शक्ति, विष्णु, ऋषि, नाग, यक्ष, महाभारत कालीन यौद्धा, दानव व सिद्ध पुरूषों की देव रूप में मान्यता प्रचलित है।

इतिहासकार डाक्टर हिमेन्द्रबाली'हिम"

अध्यक्ष सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा।(हि.प्र.)