समझौता

एह जिंदगी तुझसे हर पल

समझौता क्यूँ करू ।


तूँ देती रहे दुख मुझको

मैं उफ्फ भी ना करूँ

इतनी हिम्मत है मुझ में

मैं रो,रो क्यूँ मरूँ

एह जिंदगी तुझसे ......


आए सुखों के पल तो

अंदर ही छुपा लेती हूँ

जब आए गम मेरे हिस्से

तो शौर क्यूँ करूँ

एह जिंदगी तुझसे .......


ये जीवन उलझी कहानी है

ये सांस तो आनी-जानी है

जिसने दिया वो ले जाएगा

मैं मौत से क्यूँ डरूं

एह जिंदगी तुझसे.......


मुझ में हिम्मत दुख सहने की

तुम हरा नहीं सकती

बुढापा चाहे दे दो

हिम्मत को चुरा नहीं सकती

जिंदादिली से जिंदगी मैं तो जियूँ

एह जिंदगी तुझसे.......।


करमजीत कौर,शहर-मलोट

जिला-श्री मुक्तसर साहिब,पंजाब