"आस का नाजुक मोती"

मुन्तज़िर न रहो संवेदनाओं के, गिरह छोड़ दो अपनों से उम्मीद की जीना है जो चैनों अमन से। 

आसान बन जाएगा जीवन जब किसीसे कोई अपेक्षा ही नहीं रहेगी निर्मोही सी ज़िस्त कटेगी।

हल्की सी मोह की गांठ खोलते ही परे हो जाती है जिजीविषा मन से जो रहती है लिपटी।

इंसानी जिह्वा की रंगत फ़िकी हो जाती है जब अपनों से ही मिलती है बेरुख़ी की छाया।

खाली हाथ आए थे खाली जाना है जब ईश ही सच्चा साथी है तो क्यूँ करनी उम्मीद जग है झूठी माया।

आस का मोती नाजुक है हल्की सी ठेस पर टूट जाएगा अपेक्षाओं की माला निर्लेप चंदन सी रखो। 

न डर कभी टूटने का संमोहन से परे महकती रहेगी ताउम्र मन की वितरागी काया।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु