नजरिया

न जाने कैसा है ये नजरिया

अपनो को कर देते हैं पराया

परायों को बना लेते हैं अपना

न जाने कैसा है ये नजरिया।


झूठ को पंख लगाते हैं 

सच कहने से कतराते हैं

परायों की बातें प्यारी लगे 

माँ बाप की एक न सुने 

न जाने कैसा है ये नजरिया।


दूसरों के घर मे ताँका झाँकी करे

और अपनो की एक न सुने

अहंकार मे मानव हो गया बड़ा

और एक पैसे के ही पीछे पड़ा

न जाने कैसा है ये नजरिया।


खुद तो कुछ कर नहीं पाते

दूसरों के कामों में टाँग अड़ाते

घर मे माँ खाने को तरसे

और गैरो की बात बनाते

न जाने कैसा है ये नजरिया।


मानव बन गया बड़ा अहंकारी

अहंकार पड़ गया उस पर भारी

अपनों से है उसकी तकरारी

निभाता फिरता गैरो से यारी

न जाने कैसा है ये नजरिया।।


परिचय- नीतू कुमारी

छात्रा व लेखिका

मु.पो. कसेरू, मुकुन्दगढ़ झुंझुनूं राजस्थान।