नारी

देर हो जाती है अक्सर 

फिर भी लिखना चाहती हूँ  

रोटियाँ गोल ही बेलनी पड़ेंगी

चूल्हा चौका गर्म रखना होगा 

घूंघट के अंदर सिसकियाँ 

और आँसू दबोचे जाएँगे 

दर्द होगा 

प्रसव पीड़ा होगी  

नये जन्म होंगे 

थकान महसूस होगी 

जिंदगी में रास्तें नापें जाएँगे 

दुसरे छोर पर बाकी 

बातें होती रहेगी

लिखने से कुछ नहीं बदलता

ना लिखूँ तो  

सिर्फ देर हो जाती है.. ।


-सोनाली मराठे 

 धुले , महाराष्ट्र