उलझनें

एक अरसा हुआ समझाते,समझती ही नहीं हैं

गुत्थियां ये जीवन की,सुलझती ही नहीं हैं


जितना सुलझाऊं इनको,उतना ही उलझ जाती हूं

जीवन पथ के हर मोड़ पर,कितनों से बिछुड़ जाती हूं


सब लगते कितने अपने कभी,कभी पल भर में बेगाने सब

कितनी पीर भरी इस दिल में,ये जाने केवल मेरा रब


यूं तो है सब कुछ पास मेरे,सोचूं तो कुछ भी पास नहीं

ये जीवन बहती सी धारा है,जो आती सबको रास नहीं


तिमिर चीर निराशा का,आदित्य आस जगाता है

फिर भी कुछ लम्हें आते जब याद,ये दिल बस भर भर आता है


जिसको शिद्दत से चाहा इस दिल ने,घाव उसी से खाया है

जिसकी खुशियों पर सब वारा हमने,नीर नयनों में वो ही लाया है


पिंकी सिंघल

अध्यापिका

शालीमार बाग दिल्ली