मेरा अभिशाप हैं कि मैं एक मजदूर हूंँ

भारत में मजदूर बनना और मजबूर होना

अपने माथे पर एक लकीर ना होना जैसा है ।

शायद विधाता की यही रजा मंदी थी 

मैं एक मजदूर हूंँ । 

 घर से निकलता हूंँ  और शहर में मजदूरी करता हूंँ । 

दिन भर परिश्रम करता हूंँ दो वक्त की रोटी के लिए ।

ख्वाहिशों की चक्की में पीसता रहता हूंँ ।

अपने सपनों को पूरा करने के लिए 

काश कभी कभी सोचता हूंँ कि मेरे भी दिन कभी बदलेंगे की नहीं 

कहीं ऐसा तो नहीं जिंदगी भर हाथौड़ा चलाते - चलाते 

मेरी कमर की हड्डी ना टूट जाए ।

और बची हुई जिंदगी चार पाई में पड़े पड़े कटे अचानक रामबाबू यादव मजदूर है ।

होश आया की ऐ बातें , सिर्फ स्पन्नो की है हकीकत ऐ है कि

आज महीने की पहली तारीख हैं। तन्खवाह मिलने का समय है।

 राम जी काका को कहकर आज दस मिनट पहले चला जाता हूंँ। लाईन में लगूंँगा तब तो नं आएगा।

 ऐ बात मन ही मन सोचता रामबाबू यादव  रोज बादलपुर काम करने जाता था ।

बादलपुर से उसका गांव भिखारी 8  किलो मीटर था ।

रोज साइकिल चलाकर आना जाना था। 

उसे एक ही जगह काम करते  बीस वर्ष हो गए थे ।

रामबाबू समय से १० मिनट पहले 

अपने मालिक के पास पहुंँचता है 

सुदर्शन गुप्ता जी सेठ ने देखकर कहा! 

 कहें रामबाबू आज जल्दी क्यों पैसा थोड़ी भागे जा रहा है ।

ऐ लो पूरे २५,०० सौ रुपए २ दिन  छुट्टी थी तुम्हारी इसलिए ५०० कट गये पगार से।

रामबाबू ने तुरंत सेठ जी से कहा मैंने तो छुट्टी ली थी।

 मेरी तबियत खराब थी इसलिए काम पर नहीं आया। 

सेठ जी कहा काम नहीं करोगे तो कौन पैसा देगा 

तंज कसकर कहा काम करने के हम पैसा देते है।

घर में बैठने के नहीं काम करना है,

तो करो नहीं छोड़कर जाओं।

 मेरे पास कामगारों की कमी नहीं है ।

रोज लाईन लगी रहती है काम वालों की ,

तुम्हारी तो उम्र हो गई है बहुत बूढ़े हो गए हो ।

सरकार का आदेश है ५० वर्ष के ऊपर के कामगार नहीं रखना है।

तुम मेरे यहांँ २० वर्ष से काम में हो इसलिए तुम्हें किसी तरह चला रहा हूंँ। 

शाम का वक्त था ,सूरज ढ़ल चुका था ।

अंधेरा बढ़ता जा रहा था।

समय ना गंवाते हुए रामबाबू ने सेठ सुर्दशन बाबू से हाथ जोड़कर जाने की इजाजत मांँग घर जाने की  जाने लगा ,

अपनी साईकल लेकर चलने लगा तो पत्नी मीरा का ध्यान आया।

 कि आज उसने घर का राशन और बच्चों के कपड़े लाने को कहा। 

मन ही मन सोच रहा था आज फिर लड़ेंगी मुझसे इतने कम पैसे पूरे दिन काम क्यूंँ नहीं किए,

 मीरा का स्वभाव तेज था। 

उसे शान सौकत दिखावे का बडा  शौक था।

 घर की स्थिति गरीबी पति की पीड़ा का तनिक एहसास नहीं था ।

रामबाबू राशन की दुकान में पहुंँचा ,

और माणिक काका से 5 किलो चावल दाल 2 किलो 5 किलो आटा और कुछ मसाले लेकर टोटल ₹1000 राशन में चले गए। उसके बाद गिरधारी लाल की दुकान में पहुंँचा तो दोनों बच्चे राम और श्याम को कपड़े ले लिए।

  चार सौ रूपए + चार सौ रूपए  रूपये  के शर्ट पैंट 8:00  रूपए हो गये और साइकिल  खराब थी इसलिए साइकिल में ट्यूब टायर चेंज करवाया तो  200. रू साइकिल में खर्च हुए। 

टोटल इस महीने की पगार से 2000रु  रामबाबू के खर्च हो गए ।शेष बचे ₹500 रूपए लेकर घर पहुंँचा और पत्नी मीरा के हाथों में दिया। और बताया राशन दिया साइकिल और बच्चों के कपड़े , छुट्टी पैसे के विषय में बताया ।

मीरा ने आव देखा ना ताव और बातों से पति का सीना छलनी कर दिया ।

रामबाबू मन ही मन सोच रहा था कि यह कैसा जीवन मिला है।

 इतना सब कुछ करने के बाद दिन भर काम करने के बाद मैं चैन से सो नहीं पा रहा हूं ।

किसी को मेरे दुख तकलीफ से  फर्क नहीं पड़ता ,

बस हाय पैसा दिख रहा है। रामबाबू मन में मीरा की बातों की पीड़ा रंज में आकर । ईश्वर से प्रार्थना करता है।

 हे ईश्वर काश तुम मुझे इस समस्या से मुक्ति दिला दे,

रामबाबू जिंदगी के इस भंवर में फंस गया 

की उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा।

मीरा को छोड़ना चाहे तो दो मासूम बच्चों का क्या होगा। उनके भविष्य की चिंता सताने लगती हैं ।

उसी पग रामबाबू अपने कदम पीछे खींच लेता है।

 बच्चों का मुंँह देखकर रामबाबू मीरा की बातें कान बंद करके अनसुना कर दिया।

 और सब कुछ सहकर  सुन कर खाना खाकर सो गया।

 राम कक्षा दसवीं कक्षा में पढ़ रहा था ।

बड़ा लड़का जिसकी उम्र 15 वर्ष थी ।

और छोटा बेटा श्याम जिसकी उम्र 12 वर्ष थी। 

वह आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था ।वक्त बीता गया और रामबाबू के हालात बिगड़ते जा रहे थे ।

इस छोटी सी कमाई पर उसका घर चलना मुश्किल हो रहा था ।

ढलती उम्र और बुढ़ापे का असर रामबाबू के शरीर पर पड़ रहा था। उससे आंँखों से कम दिखने लगा अब पहले जैसी  मेहनत भी कम होने लगी ।

सुदर्शन सेठ की‌ वैल्डिंग लोहे की दुकान में दिनभर  हथौड़ा भी चलाना पड़ता है।

 सेठ ने उसकी हालत को देखकर उसे कल से काम में नहीं आने  कहकर चला जाने लगा। 

रामबाबू गिरकर हाथ जोड़कर रोने लगा सेठ जी मुझे काम से मत निकालिए ,

विनती करने लगा मेरे बच्चों क्या क्या होगा मैं मर जाऊंगा।

उसकी बातों का व रोने का सुदर्शन सेठ पर कोई असर नहीं पड़ा ।

रामबाबू की बातों को अनसुना कर मुंँह फेर कर चलते बने सेठ जी।

 काम छोड़ने के बाद रामबाबू अन्य कई ठेकेदारों की पास गया । 

लेकिन कोई उसे काम पर रखने को तैयार नहीं हुआ ।

वजह उसकी उम्र घर में रहते रहते घर की व्यवस्थाएं डगमगाने लगी ।

एक कमाने वाला था

 वह भी घर में बैठ गया ।

मीरा दिन भर चै चै करती और एक दिन अचानक रामबाबू जोर से झटका आया ।

और हार्ट अटैक से मर गया उसकी चिंता गरीबी मनोदशा परिवार की स्थिति का उसके जीवन पर बहुत बड़ा असर पड़ा। और बीमारी तो एक बहाना बन कर उसे लेने आई ।

सच तो यह है कि वह खुद ही इस मुक्ति सागर जीवन से मुक्त होना चाहता था। 

आज रामबाबू जैसे हमारे समाज में बहुत सारे गरीब मजदूर हैं।

 जो मजबूर होकर मजदूरी करते हैं। गरीबी से पीड़ित है।

 उनका शोषण हो रहा है ।

उनका ध्यान ना हमारी सरकार दे रही है ।

ना हमारा समाज दे रहा है ।ना हमारे बड़े पूंजीपति जमीदार ठेकेदार दे रहे हैं ।

ना कोई बीमा फंड इंश्योरेंश पीएफ एसआई कुछ भी उन्हें नहीं मिलता।

 मासिक जिससे उनका भविष्य सुरक्षित रहे।

 आज मजदूरों की दशा को देखकर हमें  आगे आना होगा। सरकार से जंग आंदोलन करना होगा । 

मजदूरों को महीने में पेंशन  की व्यवस्था हो उन्हें सरकार से राशन फ्री मिले ,

और उनका परिवार आसानी से चल सके। 

इसके लिए उनके रोजगार की व्यवस्था हो ।

और उनकी उम्र का भी ध्यान दिया जाए। 

उम्र के अंतिम पड़ाव 10 वर्ष पहले उन्हें सरकार से रिटायर काम छोडने पर पेंशन प्रावधान होना चाहिए ,

पैसे मिलना चाहिए ।

 जिससे कि उनका जीवन बसर हो सके  । 

यही सारे कारण है हमारे मजदूर आज मजबूर है ।

आज ऊंँचे ऊंँचे महल बिल्डिंग को बनाकर इमारत को खड़ी कर कर बिल्डर्स , प्रापर्टी , कंट्रक्शन ,फ्लैट के द्वारा काफी पैसा कमा रहे हैं।

लाखों करोड़ों का मुनाफा हो रहा है।

  फैक्ट्री,आफिस, कंपनी ,ब्रिज, हाईवे,सड़क ,माल,अस्पताल स्कूल, कॉलेज ,मकान, दुकान, होटल, खेल मैदान आज जो भी देश शहर गांँव की सुंँदरता है वो हमारे मजदूर भाइयों के कारण है।

अमीर लोग व्यवसाय करके उन्नति करके अरबपति पूंजीपति बन गए । 

उसमें कहीं ना कहीं हमारे मजदूर भाइयों का योगदान है।

 तो हमें अपने मजदूरों भाईयों  का ध्यान देना है। 

उनकी आर्थिक स्थिति का उनके रोजगार का उन्हें उनके सम्मान का तभी हमारे भारत में मजदूर आत्मनिर्भर हो सकते हैं।

आसानी से जीवन यापन कर सकते हैं।

शैलेन्द्र पयासी युवा लेखक विजयराघवगढ़ कटनी मध्यप्रदेश