बरसों बदरा फिर एक बार

बदरा  एक   बार  फिर   बरसो,

क्षोभ धुले जन जन के मन का।

गरजो  दिल  दहलाओ  लेकिन,

क्षीर  बनो  मीठे   जीवन   का।

बदरा एक बार फिर बरसो.......

रक्त   भूमि   का  सूख  रहा  है,

पीली  पड़   गई   धानी   चूनर।

कितने शवों को खुद  में समाए,

छलनी  हो  रही  भीतर  भीतर।

स्रोत  क्षीर   के   रिक्त  हो  गए,

भर जाओ  तुम  बनके  निर्झर।

बदरा एक बार फिर बरसो......

पतझड़   में   हरियाली  लाकर,

वसुधा   का  श्रृंगार   किया  है।

तपती  क्लांत  धरा  को  तुमने,

सावन  का  मधुमास  दिया  है।

रोग  दोष से  पीड़ित  जन  को,

अमृत  सौपों  नव  जीवन  का।

बदरा एक  बार फिर बरसो......

स्नेह  तुम्हारा  कोई  न  समझा,

मन  की  तपिश  बुझाई  तुमने।

जलती   यहां    चिताएं  धूं - धूं,

पर  एक  बूंद  न  बहाई  तुमने।

आज  धरा  की अग्नि  बुझा दो,

बरसो   बन  तुम  नव   उपहार।

बदरा   एक   बार   फिर  बरसो....


सीमा मिश्रा,वरिष्ठ गीतकार कवयित्री व 

शिक्षिका,स्वतंत्र लेखिका व स्तम्भकार,

स०अ०,उ०प्रा०वि०-काजीखेड़ा,खजुहा, 

फतेहपुर-उत्तर प्रदेश