स्विकार कर

मनुष्य तू स्विकार कर।

मनुष्य तू उपकार कर।


शिकार करने को चला था।

हो गया खुद ही शिकार।


प्रकृति को खूब छला,क्या दिया तूने हिसाब।

यहां, प्रकृति नें भी छक कर ले लिया हिसाब। 


तूने जमकर फैलाया प्रदूषण। अब,

खुदी का सांस लेना हो रहा दुश्वार ।


खताएं तो तूने की है बे हिसाब ।

कोरोना के कहर नें भी जमकर दिया जवाब।


खूब घमंड था तुझको तेरे ज्ञान और विज्ञान पर। 

प्रकृति नें भी तुझको बेहतर आइना दिखला दिया। 


प्रकृति के विनाश के हमीं तो हैं कारण यहां।

पुष्प पल्लव गिड़गिड़ा रहे थे, वृक्ष भी चित्कार रहे थे।

कह रहे थे।

मैं ही तेरी प्राण वायु,मैं ही तेरी प्राण वायु।


नर तू धर्म कर,यूं ना हम पर अधर्म कर।

हमें भी दे दे प्राण वायु,हमसे ले ले प्राण वायु।


वृक्ष आदि से ही आधार हैं।

प्राण वायु के विपुल भण्डार हैं।


पृथ्वी नें बल दिया तो बादलों नें भी। 

जल दिया।अब ना तू त्रास कर, तू ही 

हमारा विश्वास कर।


वृक्ष की यह याचना है, वृक्ष की

यह प्रार्थना है। मनुष्य तू स्विकार कर।

मनुष्य तू उपकार कर।मनुष्य तू उपकार कर।


श्रीमती रमा निगम 

वरिष्ठ साहित्यकार भोपाल म.प्र.

nigam.ramanigam@gmail.com