विनाश काले विपरीत बुद्धि

दुनिया में हर कहावत,हर लोकोक्ति और हर मुहावरे का अपना एक तार्किक अर्थ होता है।अवश्य ही ये सब मुहावरे और कहावतें विविध घटनाओं के तर्क को ध्यान में रखकर ही रचे गए होंगे।

सच ही कहा गया है

" विनाशकाले विपरीत बुद्धि"

अर्थात् जब बुरा समय आता है अर्थात् जब विनाशकाल आता है तो बुद्धि भी उल्टी काम करनी शुरू हो जाती है।

ऐसा ही कुछ हुआ है दिल्ली के मशहूर पहलवान सुशील कुमार के केस में।

उस पूरे वाकया को उनका विनाश काल ही बोला जाएगा जिसमें उनकी बुद्धि विपरीत दिशा में गमन करने लगी और उन्होंने उस क्षण न आव देखा न ताव,बस बह गए अपने उबाल खाते खून के प्रवाह में और जोश में अपने होश खो बैठे बिना अंजाम की परवाह किए क्योंकि उस पल उनका ख़ुद के हो दिमाग पर नियंत्रण नहीं था एवम बुद्धि ने भी काम करना बंद कर दिया था जिसके चलते उन्हें सही गलत का भान नहीं रहा और उसी  के प्रभाव में वो ऐसा काम कर बैठे जिसके लिए शायद उनको कभी माफ़ी भी नहीं दी जा सकती क्योंकि उनका अपराध अक्षम्य है। उन्होंने एक ऐसी वारदात को अंजाम दिया है जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

सुशील कुमार भारत की राजधानी दिल्ली में रहने वाले एक कुश्ती पहलवान हैं जो 2012 के लंदन ओलंपिक में रजत पदक, 2008 के बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर लगातार दो ओलम्पिक मुकाबलों में व्यक्तिगत पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने।

गौरतलब है कि दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में 4 मई की रात को इस ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार ने पहलवान सागर धनकड़  को किडनैप किया और दिल्ली के ही छत्रसाल स्टेडियम में अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर उसका मर्डर कर दिया।

इतना ही नहीं,मर्डर करते ही सुशील कुमार दिल्ली छोड़कर भाग गया और पंजाब से पकड़ा जाने पर दिल्ली पुलिस ने उसको जेल में  सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। सुशील पर किडनैपिंग, मर्डर और आपराधिक साजिश का आरोप है जिसके चलते उनको उम्रकैद या फांसी की सजा मिल सकती है।

उन्नति के चरम पर पहुंच कर कोई इंसान इतनी घिनौनी हरकत कैसे कर सकता है,कैसे वो किसी की जान ले सकता है,कैसे खेल के मैदान में जीत तक डटे रहने वाला एक इंसान अपने गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए शहर छोड़ कर भाग सकता है.??

सोचने का विषय है कि क्या किसी इंसान के जीवन की परिस्थितियां उस पर इतनी हावी हो सकती हैं कि वह सही गलत में भेद न कर पाए और इस कदर अपना मानसिक संतुलन खो बैठे कि दूसरे इंसान की जान तक लेने में उसे हिचकिचाहट न हो।

निसंदेह सुशील कुमार के जीवन का यह समय उनके लिए विनाश काल ही रहा जो जीवन के इस पड़ाव पर आकर इतनी सफलता और ख्याति हासिल करने के बाद उनके हाथों यह दुष्कृत्य हुआ।

सीख लेने की जरूरत है कि जीवन में चाहे जो परिस्थितियां हों,लेकिन इंसान को खुद की भावनाओं को सदैव नियंत्रण में रख क्रोधवश जोश में आकर कभी भी होश नहीं खोने चाहिएं क्योंकि जब समय हमारे अनुकूल नहीं होता तब हमारी बुद्धि विपरीत दिशा में काम करने लगती है जिस पर लगाम लगाने की बेहद जरूरत होती है।

पिंकी सिंघल

अध्यापिका

शालीमार बाग

दिल्ली