अपने कातिल को अपना मुंसिफ बनाने की सजा

(पवन सिंह)

सुदर्शन फाकिर साहेब की कलम के दो चुनिंदा शेरों से अपनी बात को आगे बढ़ाऊंगा ...शेर है--

मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है

क्या मेरे हक़ में फैसला देगा।

और दूसरा शेर है--

नाख़ुदा को ख़ुदा कहा है तो फिर

डूब जाओ, ख़ुदा ख़ुदा न करो...

गोया ये दोनों शेर शायद आज के हालातों पर मौजूं हैं। ये कतई जरूरी नहीं है कि इन चंद लाइनों के भीतर का एहसास हर शख्स के दिल-ओ-दिमाग को छुए क्योंकि तमाम लोगों को अब बुतों में ख़ुदा नजर आता है और जुबान या अल्फ़ाज़ में कौम व लिबास से पहचान...। झूठ  एक हकीकत सा नजर आता है और इंसान एक खिलौना और लाशें एक मुकद्दस मौक़ा....ऐसे में कौन समझेगा और कौन समझाएगा? दरअसल मेरे मुल्क में चली नफरतों की आंधियों ने इंसान नहीं मारे हैं बल्कि जज्बात मार दिए हैं। इस आंधी ने एक-दूसरे के दुख-दर्द को महसूस करने के एहसास को खत्म किया..."सियासत" हाथों में नफरतों की तलवार, चिताओं की लकड़ियों की मशाल और दहकती देंह की घुड़सवारी पर सवार है और अफसोस ये है कि तमाम लोग ऐसे हैं जो इस मंजर में भी खुश हैं। बशीर बद्र साहेब का एक शेर है---

यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं 

मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे।

लोगों को यह एहसास ही नहीं हुआ कि वो कब और कैसे अपने ही कातिल को अपना ही मुंसिफ बना बैठे--

मैं ज़िंदगी की सहर लेके आ गया

कातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया।

...तमाम मुल्कों के हुक्मरान और तमाम वैज्ञानिक और डाक्टर बार-बार बादशाह-ए-हिंदुस्तान को आगाह करते रहे कि तैयारी कर लें ... मौतों का तूफान तेरी ओर का रूख कर चुका है। .. लेकिन बादशाह नहीं माना...अपने ही मुल्क की दवाएं, वैक्सीन, आक्सीजन विदेश भेजता रहा..क्योंकि उसे पता था कि उसका साथ यहां की आवाम फिर भी देगी। इसीलिए उसने इस आफत को मुकद्दस मौ़का माना। नफरत की खुमारी से लिपटी चादर आवाम की पहले ही होशो-हवास उड़ा चुकी है ... बादशाह सलामत सल्तनत दर सल्तनत जीतने की ख्वाहिशों को पाले रहा। जिस पर बादशाह की खूनी खुशी रोकने की जिम्मेदारी थी वे सब दरबारी हो गये और‌ लोग लुटते रहे... श्मशानों में इंसानी बदन सुर्ख लाल-पीली आग में जलते रहे... सिलसिला जारी है। बादशाह के पीछे खड़े होने वालों की वही पहले सी कहानी है। सुना था लोग लाशों पर रोते हैं लेकिन मेरे मुल्क का तो मंजर ही बदल गया है इसे मौतों के त्यौहार और व्यापार व मुनाफे में पिरो दिया गया है।... बादशाह-ए-हिंद को बचाने वाले फिर मैंदा में हैं कि ये आफत कुदरती है लेकिन समझाने वाले कहते हैं जब पहले से पता था तो तैयारी कर लेते... लेकिन कौन सुनता है सही बात। अपने मुल्क में अब सच के लिए लड़ने व बोलने का रिवाज़ नहीं रहा। दुनियां के प्रख्यात मेडिकल जनरल "लैंसेट" ने अगस्त तक भारत मे 10 लाख मौतों का अन्देशा जताया था। जनरल ने लिखा कि अगर ऐसा हुआ तो इसके लिए सिर्फ बादशाह-ए-हिंद जिम्मेदार होगा। 

दुनियां की सबसे बड़ी साइंस मैगजीन "लैंसेट" अपने एडिटोरियल में लिखती है कि बादशाह-ए-हिंद का विशेषज्ञों की सिफारिशों को दबाना और खुले में विमर्श की अनदेखी किया जाना माफी लायक नहीं है। कोरोना की टास्क फोर्स की महीनों बैठक नही की गई और देश को मौत के गहरे कुएं में झोंक दिया गया। काल भी चित्कार उठा....लेकिन बादशाह सलामत का महल बन रहा है। एक कफन बार-बार बिक रहा है। लकड़ियां जिस्म जलाने को कम हैं फिर भी वो हंस रहा है।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं।

लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पण:किं करिष्यति।।

अर्थात:- जिस मनुष्य के पास स्वयं का विवेक नहीं है, शास्त्र उसका क्या करेंगे। जैसे नेत्रविहीन व्यक्ति के लिए दर्पण व्यर्थ है।

मौजूदा हालात पर मेरी लिखी चंद लाइनें हैं---

"ये दोस्त देखती, इसे न पहचान दुश्मन की

आग है इसका कोई पता थोड़ी है।

आज तेरे घर को फूंक कर आई है।

कल किस गुजरगाह से गुजरेगी

इसका पता थोड़े ही है।"

केवल प्रार्थना की जा सकती है कि इस खूबसूरत मुल्क को मौत के तूफान से बख्श दे खुदा। वरना इंसान ही नहीं रहेगा तो तेरी पूजा, तेरी इबादत, तेरी अरदास कौन करेगा?...इस मुल्क के लोगों को नज़र-ए-इनायत दे "मां भारती" कि लोग अच्छे-बुरे का फर्क कर सकें और सच को सच कह सकें।