“कैसी हो रितु?”

“ठीक हूँ, सीमा! पर देश के माहौल का असर दिल-दिमाग पर तो होगा ही। सन इक्कीस के पूरे अप्रैल-मई चर्चाओं का बाजार गर्म रहा कि संक्रमित लोगों की बेतहाशा बढ़ती संख्या का असली जिम्मेदार कौन? देखते ही देखते जून महीना भी आ गया। बीस में तबलीगी जमात के लोगों के सर ठीकरा फूटा था। इस बार कुंभ नहाने गए लोगों का अपने अपने क्षेत्र में वापस लौटना तथा पाँच राज्यों में हुए चुनाव को इसका जिम्मेदार ठहराया गया।”

“हाँ दोस्त! तेरा कहना सही है। पर आम जनता ने अपने गिरेबान में कतई झाँकने की कोशिश नहीं की। हमने भी मास्क लगाने की और सामाजिक दूरी की जिम्मेदारी ठीक तरह से नहीं निभाई। शादी-विवाह, सैर-सपाटा वह भी बिना मास्क के! प्राणों से ज्यादा तस्वीर प्यारे हैं लोगों को!”

“हाँ सीमा! चुनाव के बाद, या कहें तो अपना काम निकलने के बाद राजनीतिज्ञों की नींद टूटी। तब शुरू हुआ आंशिक लॉकडाउन, लॉकडाउन, सामाजिक दूरी, विसंक्रमण, मास्क लगाने के सही तरीके पर प्रवचन, बेमतलब न घूमने की अपील।”

“ठीक कहा रितु! अब आम जनता भी डर गई है, उसने हिदायतों पर ध्यान देना प्रारंभ किया है, महामारी का चढ़ता ग्राफ नीचे आने लगा है, पर देखना, कितनी जल्दी लापरवाही फिर घर करेगी।”

“सीमा! पूरे वर्ष और उनकी हालातों पर नजर दौड़ाने के बाद तुझे नहीं लगता, इंसान कितनी जल्दी भूलता है! जैसे ही कुछ सुधरना शुरू होगा, वह वही गलतियाँ पुनः दुहराएगा।”

“सही कह रही हैं सखी जी! वैसे भी राजनीतिज्ञों से यही तो सीख रहे हैं, दूसरे पर दोषारोपण किया और आगे चल पड़े।”

“जो भी हो, मुझे जैसे ही सर्दी-खाँसी और बुखार हुआ, डॉक्टर की सलाह पर मैंने भी जाँच करवा लिया है। रिपोर्ट के बारे में सोचती हूँ तो चक्कर आने लगते हैं। स्वयं को पृथक कर लिया है।”

“हूँऽऽ! चलो फिर बात होती है”, उधर से फोन डिस्कनेक्ट हो गया।

कमरे में लेटी-लेटी जाने क्या सोच रही थी कि पतिदेव ने घर में प्रवेश किया और कहा, “कहाँ हैं मैडम? कोप भवन से निकलिए, रिपोर्ट नेगेटिव है। देर आयद दुरुस्त आयद, कहा जा रहा है कि सरकार की सही नीतियों तथा आमजन के टीकाकरण से महामारी की समाप्ति शायद निकट ही है।”

सीमा ने जागती आँखों ने एक सपना देखा, “कोविड-19 की विदाई हो गई है और देशवासी मास्क के झंझट से मुक्त आजाद घूम रहे हैं, खुलकर साँसे ले रहे हैं।”

तभी घंटी बजी, तंद्रा से जागी, टीवी की खौफनाक खबरें देखते-देखते शायद सो गई थी। सहेली का फोन आना और पृथकवास, सब एक सपना था। सपने का जून 2021 उसे पसंद आया। कामना की, “काश ऐसा ही हो?” पर जानती थी, दिल्ली अभी दूर है।

#नीना_सिन्हा/पटना।(मौलिक)