शांतिपूर्ण सह - अस्तित्व के लिए गांधी को संग्रहालयों और पुस्तकालयों से बाहर निकालने की ज़रूरत है :रामदत्त त्रिपाठी

 दुनिया में शांतिपूर्ण सह अस्तित्व हमेशा एक बड़ी चुनौती रही  है। ऐसा नहीं है कि केवल अलग-अलग धर्मों के लोग लड़ते हैं। अपितु एक ही धर्म के अंदर भी कई युद्ध हो चुके हैं और आज भी हो रहे हैं।  चाहे यूरोप में ईसाई आपस में लडे हों, पश्चिम एशिया में इस्लामी दुनिया में लोग लड़ रहे हैं। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में लड़ रहे हैं। हिंदुस्तान में भी केवल हिंदू - मुसलमान में झगड़ा नहीं है। अतीत में  बौद्ध और सनातन धर्मी या शैव और वैष्णव आपस में कम नहीं लड़े  हैं | मुझे लगता है कि बौद्धों के मठों को बाहर के लोगों ने नहीं तोड़ा होगा, सारनाथ और अन्य जगह| शिया - सुन्नी झगड़े हम देख ही रहे हैं . 

धीरे-धीरे दुनिया भर में लोगों को यह एहसास हुआ हमारा कि  हित एक साथ मिलकर रहने में ही है | दुनिया का हमारा शरीर ही जाने कितने तरह के बैक्टीरिया मिलजुलकर चलाते हैं . 

गांधी जी एक मात्र ऐसे रहनुमा थे जिन्हें तीन महाद्वीपों एशिया , योरप और अफ़्रीका में विभिन्न धर्मों और समुदायों के साथ मिलकर काम करने का प्रत्यक्ष अनुभव था . 

भारत के विशेष संदर्भ में उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ में हिंदू मुस्लिम एकता पर मिलजुलकर रहने पर बहुत ज़ोर दिया था। 

जब लंदन से अफ़्रीका वापस आ रहे थे जहाज में , उनके विचार अंदर से  उबल रहे थे। उन्हें अंदर से प्रेरणा हुई  कि मुझे लिखना है | इसके पीछे यह कारण था कि वह लंदन में वी डी सावरकर और श्यामजी कृष्ण  वर्मा जैसे लोगों से मिले थे, जो हिंदुत्व का झंडा उठाए थे और हिंसा में भी विश्वास करते थे।गांधी को  यह खतरा लगा था कि ये लोग हिंदुस्तान में क्या गड़बड़ कर सकते हैं | 

लंदन में वे जो सावरकर और उनकी टीम के लोग थे, या जो सशस्त्र संघर्ष  को मांने वाले मार्क्सवादी लोग या जो मुस्लिम राष्ट्र की बात कर रहे थे उन सबका जवाब देने के लिए उन्होंने ‘हिंन्द स्वराज’ लिखा था। उसमें बहुत सारी बातें थी| ‘हिंद स्वराज’ गांधी जी ने 41 वर्ष की आयु में लिखी थी और गांधी जी उन विचारों पर अंत तक टिके रहे| गांधी जी जब राजकोट में स्कूल में पढ़ते थे, तभी से उनकी मुस्लिम युवकों से मित्रता थी। दक्षिण अफ़्रीका में हिंदू - मुस्लिम -ईसाई गुजराती तमिल सबके साथ मिलकर उन्होंने काम किया।इसलिए उनका सोच सबको साथ लेकर चलने का था। 

‘हिंद स्वराज’ में एक अध्याय है ‘हिंदू और मुसलमान|’ जिसमें उन्होंने लिखा है कि, “एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक दूसरे के धर्म में दखल नहीं देते हैं , अगर देते हैं तो समझना चाहिए कि वह एक राष्ट्र होने लायक नहीं हैं। अगर हिंदू मानें कि  सारा हिंदुस्तान, सिर्फ़  हिंदुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा  सपना है।मुसलमान अगर ऐसा मानें की उसमें सिर्फ़ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए।फिर भी हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक देशी, एक मुल्की हैं, वे देशी भाई हैं ; और उन्हें एक दूसरे  के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा।”    

भारत राष्ट्र के बारे में गांधी जी का यह सोच था। मतलब  ऐसा नहीं है कि एक राष्ट्र सिर्फ एक धर्म के लोगों का होगा, वरन एक राष्ट्र में तो बहुत से धर्मों के  लोग रह सकते हैं | यह बात गांधी जी ने 1909 में कही थी |

हिंद स्वराज में  उन्होंने यह भी कहा कि हिंदुस्तान में मुस्लिम बादशाह रहे, उनके शासन के अंदर हिंदू रहे | उसी प्रकार हिंदू बादशाह के अंदर मुस्लिम रहे और फले-फूले | दोनों को बाद में समझ आ गया कि  झगड़ने से कोई  फ़ायदा नहीं, हमने एक साथ रहना सीख लिया था |

हिंदू और मुसलमान दोनों को समझाते हुए  गांधी जी ने हिंद स्वराज में लिखा, “बहुतेरे हिंदुओं और मुसलमानों के बाप दादे एक थे, हमारे अंदर एक ही ख़ून है।क्या धर्म बदला इसलिए आपस में हम दुश्मन हो गए? धर्म तो एक ही जगह पहुँचने के अलग - अलग रास्ते हैं।हम दोनों अलग - अलग रास्ते लें, इसमें क्या हो गया।उसमें लड़ाई काहे की?”

गांधी जी रामराज की बात करते थे। तुलसीदास ने भी राम राज की अपनी कल्पना में लिखा है :

“सब नर करहिं परस्पर प्रीति। चलहिं स्व धर्म निरत श्रुति नीति।।

गांधी जी ने एक जगह इस सूत्र का उल्लेख किया है , “अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम ।।”

यानि  अपना पराया तो छोटी बुद्धि वाले कहते हैं। उदार मन वाले लोगों के लिए तो पूरी वसुधा ही कुटुंब  यानि परिवार है। 

गांधी जी ने कहा, “ झगड़े तो फिर से अंग्रेज़ों ने शुरू कराए।” हमारे मध्य यह भेदभाव और धर्म की लड़ाई अंग्रेजों ने लगाई है | आज के समय में अंग्रेज का मतलब है सत्ता, जिस प्रकार के लोग आज  दिल्ली में  बैठे हुए हैं । यू.पी. के चुनाव में प्रधानमंत्री के स्तर से कब्रिस्तान और श्मसान की बातें हुई ,  यह बातें कही गयीं यह जो सत्ता है  उसके लिए। गुजरात चुनाव में तो औरंगज़ेब का भी इस्तेमाल हुआ.

राजनीति और सत्ता जन सेवा का माध्यम है। लेकिन आज  सत्ता हासिल करना ही लक्ष्य हो गया है, जिसके लिए  सिद्धांतों की बलि देकर तरह - तरह के समझौते करते हैं। आज  चुनावी राजनीति बहुमत हासिल करने के लिए अलगाव और विभेद पैदा कर रही है। कुछ दल मुस्लिम धार्मिक नेताओं का सहारा ले रहे हैं, तो कुछ हिंदू धार्मिक साधू संतों का।

मानव जाति के मध्य जो झगड़े होते हैं| , वह भय, असुरक्षा और लालच के कारण होते हैं | पहले तो अल्पसंख्यकों को ही असुरक्षा का खतरा होता था किन्तु आज तो बहुसंख्यक को भी खतरा लग रहा है | आज सुनियोजित तरीके से बहुसंख्यक लोगों के मध्य असुरक्षा और हीन भावना पैदा की जा रही है | उनको कहा जा रहा है कि तुम्हारे मंदिर नष्ट हो जायेंगे, तुम्हारी पूजा कम हो जाऐगी, तुम्हारी आबादी कम हो जएगी | वे कहते हैं कि साहब हिंदुस्तान में तो  हिन्दू होना गुनाह है। इस तरह भड़काते हैं लोगों को।

आज गोरक्षा का एक बहुत बड़ा सवाल है उठ गया है । आर एस एस के प्रमुख मोहन भागवत जी ने कहा है कि गोरक्षा पर देश भर में कानून होना चाहिए | गांधी जी के ‘हिंद स्वराज’ में भी गौ रक्षा पर भी टिप्पणी  है | कितनी दूर दृष्टि थी | 

गांधीजी का जो रचनात्मक कार्यक्रम था उसमें गौ सेवा एक बड़ा कार्यक्रम था | गांधी जी मानते थे कि हिंदुस्तान खेती प्रधान देश है, इसलिए गाय कई  तरह से उपयोगी जानवर है। और पूज्य है।

हिंद स्वराज में उन्होंने कहा, “जैसे मैं गाय को पूजता हूं; वैसे ही मैं मनुष्य को पूजता हूं, जैसे गाय उपयोगी है, वैसे ही मनुष्य भी - फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिंदू | तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लडूंगा? क्या मैं उसे मारूंगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान का और गाय का भी दुश्मन बनूंगा | इसलिए मैं कहूंगा कि  गाय की रक्षा करने का एक ही उपाय है कि हमें अपने मुसलमान भाई  के सामने हाथ जोड़ना चाहिए और उसे देश की ख़ातिर  गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए | और अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे वश की बात नहीं है | अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती हो तो अपनी जान दे देनी चाहिए लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए| यही धार्मिक कानून है ऐसा मैं मानता हूं|”

यह विचार था गांधी जी का कि  गाय पूजनीय होते भी, उसकी रक्षा के लिए किसी इंसान की जान लेने का हक़ हमें नही है। समझाने के लिहाज़ से उन्होंने आगे फिर लिखा हिंद स्वराज में, “मेरा भाई गाय को मारने दौड़े तो मैं उसके साथ  कैसा बर्ताव करूँगा? उसे मारूँगा या उसके पैरों में पड़ूँगा? अगर आप कहेंगे कि  मुझे उसके पाँव पड़ना चाहिए, तो मुझे मुसलमान भाई के भी पाँव पड़ना चाहिए।”

गांधी का नज़रिया बहुत साफ़ था। किंतु आज क्या हो रहा है अलवर और दादरी में जो हुआ क्या वह सही हुआ ?

मुझे तो भाई सबसे शिकायत है खासकर मठी गांधीवादियों से कि अलवर क्यों नहीं जाते हो | केवल  गांधी विचार का गुणगान करने से काम नहीं बनेगा, गांधी तो कर्म था | जो किया उन्होंने कर्म से किया है | गांधी चाहते तो चंपारण पर शोध करके पीएचडी की उपाधि पा सकते थे; डी.लिट. पा जाते किंतु उससे क्या होता? उससे तो देश नहीं आजाद होता और न ही उससे समस्या हल होती| तो गांधी इसलिए गाँधी हैं | 

लेखक रामदत्त त्रिपाठी 

(नोट : चम्पारण सत्याग्रह के उपलक्ष्य में पटना में 10 - 11 अप्रैल 2017 को गॉंधीवादियों के राष्ट्रीय समागम में राम दत्त त्रिपाठी के भाषण के मुख्य अंश . राम दत्त त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और जे पी आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता के नाते इमर्जेंसी में जेल में बद थे . सुनने वालों  में समागम के मुख्य आयोजक और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शामिल थे . )