शेर ग़ज़लों के,,,,,,,

1.

पल ज़िन्दगी के जो थे सुहाने सुहाने नहीं रहे,

रिश्ते भी खून के थे वो भी हमारे अब नहीं रहे,

2.

लोग मिलते हैं जुदा होते हैं बिछड़ भी जाते हैं,

लम्हे  ज़िन्दगी के रुकते  नहीं गुज़र ही जाते है,

3.

अपने हलक़ से  अपनी  छुरी गुज़ार लेता हूँ,

भाई का ही खंजर है, सीने में उतार लेता हूँ,

4 .

मुद्दत्तें गुज़री  भूलना मुमकिन ही नहीं है,

दूर सहरा में जाकर उसको पुकार लेता हूँ,

5.

आंगन भी मेरे  सुने, गलियां और मुहल्ले भी,,,,,,

कैसी वबा आई नाम जिसका कोरोना बताते हैं,

6. ए अर्श  और फ़लक़ बतला क्या ज़ीस्त 

का सामान ये ही है,,,,

इंसा बास्त कितनी करता है सही बतला 

क्या औक़ात ए इंसान ये ही है,,,,

7 .बीते लमहों की चादर का कफ़न ओढ़ लिया है,

रिश्ता खून का  सही ,तआलूक़ अब तोड़ लिया है,

8.अहसासे ग़म कोई भी नहीं उनको अब होने वाला,

हुआ सख़्त नरम मैं भी कभी अब नहीं होने वाला,,,,,


डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

सहज़

हरदा, मध्यप्रदेश,