ज़ख्म जो अपनों ने दियें

मैं  तुहारा  था, लेकिन 

अब तुम्हारा न रहा,

आरज़ू जो तुम्हारी , हुई 

पूरी ,तुम्हारा न रहा,

इतनी मुद्दत क्यों कैसे 

तुम्हारे साथ में गुज़री,

महरबानी रब की

,लावारिस तुम्हारा न रहा,

बात मान जाऊं, नहीं ये 

मुमकिन नहीं होगा,

जैसा था पहले सच मैं

वैसा बिल्कुल न रहा,

ज़ख्म  जो अपनों ने दियें 

,वो नासूर बन गए ,

ज़िंदा हूं मैं मगर ,लगता है 

अब  ज़िंदा न रहा,

थका थका सा हूं अहसास

के पंछी की तरह

कितना बोझिल हूं न दो 

ऐतबार  मुश्ताक़,,,


डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह

" सहज़ " हरदा मध्यप्रदेश