प्रकृति से छेड़ छाड़

अंधकार में धँसे निरन्तर तज कर सुखद उजाला।


जानबूझ कर पैर कुल्हाड़ी खुद मारी है हमने।

छेड़ छाड़ की खूब प्रकृति से देखे सुन्दर सपने।

पेड़ काट कर धरा प्रकृति को है विकृत कर डाला ।

अंधकार में धँसे निरन्तर तज कर सुखद उजाला ।।


सुख साधन के चक्कर में पड़ कृतिम रूप अपनाया ।

प्रकृति सम्पदा को हमने ही दूषित कर ठुकराया ।

अमृत घट का किया अनादर भाया विष का प्याला ।

अंधकार में धँसे निरन्तर तज कर सुखद उजाला ।।


पेड़ काट सौन्दर्य धरा का बिल्कुल किया सफाया ।

जल की की बर्बादी हमने जम कर खूब बहाया ।

सूखा और अकाल, पड़ेगा भूख प्यास से पाला ।

अंधकार में धँसे निरन्तर, तज कर सुखद उजाला ।।


साँस-साँस को तड़प रहे हैं ऑक्सीजन को तरसे ।

हरे भरे तरु स्वंय हमीं ने तब तो काटे जड़ से ।

जीवन खतरे में स्थिति को यदि अब नहीं सम्हाला ।

अंधकार में धँसे निरन्तर तज कर सुखद उजाला ।।


 श्याम सुन्दर श्रीवास्तव 'कोमल'

        व्याख्याता-हिन्दी

  अशोक उ०मा०विद्यालय, लहार

             भिण्ड, म०प्र०

             मो०- 8839010923