कुछ तुम पर लिखूँ

लिखते  रहे  मुझ  पर  ही   तुम,

क्यूं ना आज कुछ तुम पर लिखूं,

भावों   के  कुछ   फूलों  को  मैं,

अर्पण  क्यूं  ना  तुम  पर  करूं।

शक्ति   है  तुम   मैं  शिवाय  सी,

ब्रह्मा    सी    है    चतुराई    भी; 

भावुक   भी  हो  निष्ठुर  भी  हो, 

गोविंद  क्यूं  ना  तुमको  लिखूं।

हो   पिता    तो    जीवन    तुम, 

संतान      की      आशा    भरी, 

आंखों    के   हो   सुंदर   सपन,

घर  की   खुशी   के   राज   हो,

तुमसे   है  घर   क्यूं  ना   लिखूं।

कर्तव्य   को   मन    से   निभा,

रखते  हो   मन   वह   पुत्र  तुम,

भाई   जो   हर   पल   साथ   दे,

राखी  का  मान  क्यूॅ  ना  लिखूं।

हो    मित्रता   की    शान    तुम, 

कभी कर्ण और  कभी राम तुम,

विपदा    में   तुम   हो    सारथी,

फिर कृष्ण क्यूं न  तुमको लिखूं।

तुम   मान  और   अभिमान  हो, 

दुनिया    हो    मेरी     प्राण   हो, 

मेरी    मांग    का     सिंदूर   हो; 

पायल    की   तुम   झंकार   हो, 

मेरी   प्रीति    हो    मनमीत   हो, 

फिर गीत क्यूं न  तुम पर  लिखूं।

लिखते   रहे  मुझ   पर  ही  तुम, 

क्यूं ना आज कुछ तुम पर लिखूं।


मोहिनी गुप्ता,हैदराबाद-तेलंगाना