जासूसी धारावाहिक मनोरंजक सीआईडी

इनदिनों टी वी पर धारावाहिकों का चलन बहुत हो गया है।मुझे से एक धारावाहिक निर्माता ने संपर्क किया।निर्माता को एक धारावाहिक बनाना है। मैने पूछा किस विषय पर आप धारावाहिक बनाना चाहते हैं?

वह बोले,जासूसी टाईप, सी.आई.डी जैसा सीरियल बनाना है।

मैने कहा आप गलत जगह आए है।मैं व्यंग्यकार हूँ।

सम्भवतः निर्माता व्यंग्य विधा से अनभिज्ञ है

निर्माता मुझे से ही धारावाहिक के लिए पटकथा लिखवाने आग्रह करने लगे ।

मैने कहा ठीक है,आप आग्रह कर रहे हो तो मैं लिख देता हूँ।

मैने कहा कहानी लिखने के पूर्व मुझे आपसे कुछ प्रश्न पूछने हैं?

मै प्रश्न पूछने के लिए कागज कलम लेकर बैठ गया और निर्माता से प्रश्न पूछने लगा।

पहला प्रश्न :- कितने मर्डर (कितनी हत्याएं) होने के बाद अपराधी का पता लगाना है?

दूसरा प्रश्न:- तहक़ीक़ात के दौरान कितने निवास के दरवाजों पर निर्दयता दिखानी है?(निर्दयता शब्द, दया शब्द का विलोम शब्द है।) यह मैं सिर्फ आपको समझा रहा हूँ। 

तीसरा प्रश्न :- कभी किसी गरीब बेबस, बेकस की हत्या की कोई घटना लिखनी है,या सिर्फ धनाढ्य  लोगों की पैतृक सम्पत्ति के कारण होने वाली वैमनस्यता के बाद की जाने वाली या किसी व्यवसायिक हत्यारें से करवाई जाने वाली हत्या का ही जिक्र करना है?

चौथाप्रश्न :- किसी दवाई निर्माता कंपनी में जहरीली दवाइयों के उत्पादन को उजागर करने वाले किसी पत्रकार की हत्या को दर्शाना है?

पाँचवा प्रश्न :-  सम्भ्रान्त परिवारों में विवाहपूर्व या विवाहोत्तर वासनामय सम्बंधो में पहले प्रतिस्पर्धा और जब सामाजिक प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती तब होने वाली या करवाई जाने वाली हत्या के दृश्य लिखना है?

छठाप्रश्न :- किसी नामचीन चिकित्सालय में चलने वाली धांधली को उजागर करने वाले वहीँ कार्यरत किसी प्रामाणिक चिकित्सक की निर्मम हत्या पर लिखना है?

सातवां प्रश्न :- कभी किसी अबला के साथ हुए बलात्कार का पर्दाफाश भी करना है?

आठवां प्रश्न :- क्या सी आई डी महकमें पर राजनैतिक दबाव के कारण तहकीकात को प्रभावित करने के षडयंत्र को भी लिखना है?

नववा प्रश्न :- प्रायः सी आई डी या जासूस लोगों के लिए यह कहा जाता है कि यह लोग मुर्दों से भी सच उगलवा लेतें हैं? क्या इस बात विश्वास रखते हुए गंगा में तैरती लाशों से सच प्रकट हो सकता है?यह लाशें अभी कोरोना महामारी  के कारण मृत लोगों की हैं या पूर्व सरकारों के समय की हैं और अभी नदी में बह कर आई हैं?

मेरे प्रश्नों की श्रृंखला को सुनकर निर्माता नाराज हो गए,कहने लगे सच मे आपस से मिलकर मैने बहुत बड़ी गलती की है।

उनके कथन को नजरअंदाज करते हुए, मैंने कहा एक अहम प्रश्न भी पूछ लिया?

आपका यह सी.आई.डी.टाईप का जो सीरियल बनेगा उसमे पुलिस का भी कोई रोल होगा अथवा नही?मैं यह बात सीरियसली पूछ रहा हूँ।प्रायः देखा जाता है,ऐसे धारावाहिको में गुनहगार पर भारतीय दण्ड विधान की धारा लगाकर आपराधिक जुर्म दायर करने वाली पुलिस नदारद ही रहती है।आप धारावाहिक बनाने वालों से फ़िल्म निर्माता ईमानदार होते है,वह पुलिस की एंट्री दिखाते तो हैं,भले ही विलंब से दिखाए।फिल्मों के निर्माताओं में इतनी तो प्रामाणित भी होती है कि, वह ज़्यादातर फिल्मों में पुलिस के अदने कर्मचारी से लेकर आला दर्जे के अधिकारी तक की अपराधियों के साथ 

सांठगांठ को निर्भयता से दर्शातें हैं?

फ़िल्म निर्माता तो रसूखदार सियासी लोगों के संरक्षण में पनपने वालें गैर कानूनी व्यापार को भी दर्शातें हैं?

वह निर्माता मेरे समक्ष झुक कर मेरे चरणस्पर्श करते हुऐ,कहने लगे सच में मुझे आपसे संपर्क नही करना था।मुझे दर्शकों के मनोरंजन के लिए सीरियल बनाना है।जन जागृति के लिए नहीं।

आप सच मे व्यंग्यकार ही हो।

शशिकान्त गुप्ते इंदौर